स्वतंत्र पार्टी

व्यक्तित्व एवं कृतित्व

[जन्म 10 दिसंबर, 1878  – निधन 25 दिसंबर, 1972]

राजाजी पर प्रायः अंसगत और बार-बार अपना पक्ष बदलते रहने का आरोप लगता रहा है। हम कुछ ऐसी महत्वपूर्ण परिस्थितियों का अवलोकन कर सकते हैं, जब उनका विरोधाभास स्पष्ट रूप से दिखाई दियाः

वयोवृद्ध किसान नेता व शेतकारी संगठन के संस्थापक शरद जोशी का शनिवार, 12 दिसंबर को निधन हो गया। 2004 से 2010 तक राज्य सभा के सांसद रहे शरद जोशी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे और उनकी पहचान मझे अर्थशास्त्री, ब्यूरोक्रेट व राजनैतिक दल 'स्वतंत्र भारत पक्ष' के संस्थापक के तौर पर भी होती ह

दो चुनावों में तारा चमका
तीसरे में  डूब गया

राजनीतिक और आर्थिक स्वतंत्रता के जरिये समृद्ध भारत बनाने की संकल्प प्रगट करके भारतीय राजनीति में एक नई लीक बनानेवाली नवजात स्वतंत्र पार्टी को अपनी स्थापना के ढाई साल के भीतर ही आम चुनाव की भारी चुनौती का सामना करना पड़ा और वह उस चुनौती का सामना करने में कामयाब भी रही। अपनी पहली चुनावी परीक्षा में  लगभग 8.54 प्रतिशत वोट और लोकसभा में अठारह सीटें प्राप्तकर वह देश की तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन गई। उसे सत्तारूढ कांग्रेस और संयुक्त कम्युनिस्ट पार्टी के बाद सबसे ज्यादा सीटें हासिल हुईं । देश के विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं की कुल सीटे जीतने के दृष्टि से वह दूसरे नंबर पर रही। गुजरात, बिहार, राजस्थान और उडीसा में वह सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनकर उभरी। इस चुनाव में जयपुर की महारानी गायत्री देवी ने राजस्थान से लोकसभा का चुनाव जीतनेवाली पहली महिला होने का गौरव हासिल किया। इसके अलावा उन्होंने सर्वाधिक वोटों से जीतने का विश्व रेकार्ड कायम कर गिनिज बुक आफ वर्ल्ड रेकार्ड में अपना नाम दर्ज कराया। फिर 1967 और 1971 में भी स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर इसी सीट से चुनाव जीतकर हैटट्रीक की।

स्वतंत्र पार्टी का 21 सूत्री कार्यक्रम

1 और 2 अगस्त 1959 को मुंबई में हुए स्वतंत्र पार्टी के तैयारी सम्मेलन में इस 21 सूत्री कार्यक्रम को स्वीकार किया गया।

आज भी कमी महसूस होती

है स्वतंत्र पार्टी की 

आजादी के बाद जब देश प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के समाजवादी समाज रचना के रंगीन और लुभावने सपनों के पीछे भाग रहा था तब देश के राजनीतिक पटल पर एक ऐसी उदारवादी राजनीतिक पार्टी उभरी जिसने न केवल नेहरू के समाजवाद का पुरजोर विरोध  किया वरन समाजवाद के नाम पर चल रहे परमिट कोटा राज को खत्म कर मुक्त अर्थव्यवस्था  को लागू करने की वकालत की । तब  उसे राजा-महाराजाओं ,जमींदारों ,धन्ना सेठों और उद्योगपतियों की पार्टी कहकर उसका मजाक उड़ाने की खूब कोशिशें हुई लेकिन देखते- देखते यह पार्टी 1967 में भारत की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई। यह बात अलग है कि वह जितनी तेजी से देश के राजनीतिक पटल पर उभरी उतनी ही तेजी से अस्त भी हो गई लेकिन भारतीय राजनीति में उसके वैचारिक योगदान के लिए उसे आज भी याद किया जाता है। उसे भारतीय राजनीति की पहली उदारवादी और मुक्त व्यापार की समर्थक  पार्टी माना जाता है। जी हां हम बात कर रहे हैं स्वतंत्र पार्टी की  जिसकी 1959 में स्थापना हुई थी लेकिन 1974 में भारतीय लोकदल में विलय के साथ वह अस्त हो गई।