साफ सफाई

राजधानी व शताब्दी सहित कुछ इक्का दुक्का रेलगाड़ियों को छोड़ दें तो भारतीय रेल में यात्रा करने का मेरा अनुभव कुछ ज्यादा अच्छा नहीं रहा है। दूर दराज के छोटे शहरों तक पहुंचने का कोई अन्य विकल्प न होने के कारण भारतीय रेल सेवा का प्रयोग करना मजबूरी ही होती है। ट्रेन में बर्थ की अनुपलब्धता, टिकट के लिए मारामारी के बाद रही सही कसर यात्रा के दौरान पेंट्रीकार का खाना और गंदे बेडिंग से पूरी हो जाती है। और तो और सामान्य रेलगाड़ियों के अप्रशिक्षित कोच अटेंडेंट, उनकी बेतरतीब गंदी वर्दी और टायलेट की स्थिति यात्रा को ‘सफर’ बनाने के लिए काफी होती है। हर बार सरकार व रेल मंत्रालय

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सर, हमारी मदद कीजिए। हम पढ़ना चाहते हैं लेकिन हमारी टीचर हमसे सर मालिश कराती हैं। हाथ-पांव दबवाती हैं। क्लास छोड़कर घूमने चली जाती हैं और कहती हैं कि प्रिंसिपल पूछे तो कह देना कि स्टेशनरी (किताब आदि) लेने गई हैं। और तो और क्लास को शांत रखने और उन्हें पढ़ाने की जिम्मेदारी मॉनिटर पर थोप जाती हैं।

सर, हमारे स्कूल में टीचर सोती रहती हैं और कुछ पूछने जाने पर झिड़क कर भगा देती हैं। सर, स्कूल में पढ़ाई की बजाए हम छात्र-छात्राओं से साफ सफाई कराई जाती है। हमें रोल नंबर के अनुसार प्रतिदिन बारी बारी कक्षा में झाड़ू व साफ सफाई करनी पड़ती है।