सरकार

एक बार की बात है। एक चमकदार और रंगीन फूलों से भरे घास के मैदान और उद्यानों के बीचोबीच स्थित एक पुराने पेड़ पर मधुमक्खियों का एक बड़ा छत्ता स्थित था। छत्ते में एक रानी मधुमक्खी थी, जिसे कुछ वरिष्ठ मधुमक्खियों के साथ छत्ते के संचालन के लिए चुना गया था। सामूहिक रूप से चयनित इस व्यवस्था को सरकार कहा जाता था। श्रमिक मधुमक्खियों को विश्वास था कि सरकार उनके द्वारा एकत्रित शहद का समुचित भंडारण करेगी और उनकी देखभाल करेगी। सरकार के उपर भी एक जिम्मेदारी थी कि वह नए नए उद्यानों की खोज करेगी ताकि मधुमक्खियों के बच्चों की आने वाली पीढ़ी के

वैश्विक गांव में तब्दील हो चुकी दुनिया के तमाम देश जहां वस्तुओं, सेवाओं व खाद्यान्नों की विनिमय प्रक्रिया को अपनाकर देश को प्रगति व देशवासियों को समृद्धि की ओर अग्रसर करने में जुटे हैं वहीं, आश्चर्यजनक रूप से हमारे देश के कुछ राजनैतिक दलों और उनके समर्थकों का अब भी मानना है कि बाजार का नियमन कर कीमतों को नियंत्रित किया जा सकता है। कम से कम पश्चिम बंगाल में आलू की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए राज्य सरकार द्वारा उठाये जा रहे कदम तो यही साबित करते हैं। ममता बनर्जी सरकार ने राज्य में आलू की लगातार बढ़ती कीमतों से निबटने के लिए कीमतों पर

सर्वेक्षण पर सवाल

जनमत सर्वेक्षणों पर कांग्रेस की आपत्ति निराधार नहीं कही जा सकती, लेकिन वह जिस तरह उन पर प्रतिबंध लगाने की वकालत कर रही है उससे उसके इरादों को लेकर संदेह पैदा होता है। क्या वह इसलिए जनमत सर्वेक्षणों के खिलाफ खड़ी हो गई है, क्योंकि हाल के ऐसे सर्वेक्षणों में उसकी हालत पतली होती दिखाई गई है? पता नहीं सच क्या है, लेकिन यह स्पष्ट है कि कांग्रेस पिछले कुछ समय से अपने आलोचकों के प्रति कुछ ज्यादा ही सख्त तेवर अपनाती दिख रही है।

एक दशक भी नहीं हुआ है जब उत्साही निवेश विशेषज्ञ और आर्थिक विश्लेषक भारत की तरक्की के गीत गा रहे थे। वे कहते थे भारत में इतनी क्षमता है कि अगले दो दशकों में यह दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक होगा। इसके लिए उन्होंने स्प्रेडशीट मॉडल्स का उपयोग किया। इसमें उन्होंने 8 से 10 फीसदी प्रतिवर्ष की वृद्धि दर डाली और अगले 30 साल का अनुमान निकाला। उन्होंने एमबीए स्कूलों में सीखा था कि कैसे ऐतिहासिक दरों के आधार पर पूर्वानुमान लगाते हैं। जाहिर है, कोई भी चीज जो 10 फीसदी की चक्रवृद्धि दर से बढ़ रही हो, 30 साल में महाकाय हो जाएगी (ठीक-ठीक कहें

यह देखना दयनीय है कि करीब-करीब हर मुद्दे पर मतभेद रखने वाले हमारे राजनीतिक दल इस पर एकजुट हैं कि राजनीतिक दलों को सूचना अधिकार कानून से बाहर रखा जाए। यह एकजुटता कितनी जोरदार है, इसका पता सूचना अधिकार कानून में संशोधन लाने के लिए पेश किए गए विधेयक से चलता है। इस पर गौर किया जाना चाहिए कि हमारे राजनीतिक दल अपने संकीर्ण स्वार्थो के लिए उस कानून को बदलने यानी कमजोर करने जा रहे हैं जिसे स्वतंत्रता के बाद सबसे प्रभावी कानूनों में से एक की संज्ञा दी गई है।

सरकार और सरकारी एजेंसिया लोकहित, रोजगार सृजन और नैतिक जिम्मेदारी के निर्वहन के नाम पर किस प्रकार से काम करती हैं और उनका क्या हश्र हो सकता है? यह नीचे प्रस्तुत लघु कथा में वर्णित वाकए से स्पष्ट हो जाता है। इस लघु कथा के माध्यम से यह भी बताने की कोशिश की गई है कि महज इमानदारी से कार्य करने की जिम्मेदारी के निर्वहन भर से ही योजना सफल नहीं होती। सरकारी रोजगार गारंटी योजना के तहत भी कमोवेश यही हो रहा है... 

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सरकार एक बार फिर गरीब और गरीबी की नई परिभाषा के साथ अवतरित हुई है। इस बार सरकार ने पूर्व के 27 रुपए की बजाए 32 रुपए को गरीबी रेखा निर्धारित करने का मानक बिंदू बताया है। अर्थात जो व्यक्ति प्रतिदिन 32 रुपए कमाता है वह गरीब नहीं है। हालांकि जैसा कि तय था, सरकार के इस मानक बिंदू का विरोध भी खूब हुआ। लेकिन अपनी गलती स्वीकार करने की बजाए सरकार व सरकारी नुमाइंदों में इसे सही साबित करने की होड़ मच गई। कोई भरपेट भोजन के लिए 12 रुपए को पर्याप्त बताने लगा तो कोई दो कदम और आगे बढ़ पांच रुपए को पेटभर खाने के लिए उपयुक्त बताने लगा। यहां तक कि रूलिंग पार्टी के एक नेता ने तो ज

भ्रष्टाचार और घोटालों के माध्यम से लाखों करोड़ों रुपए का वारा न्यारा कर चुकी सरकारों का यह बयान कि "घोटालों से देश को जीरो लॉस हुआ है" यह बताने के लिए काफी है कि करदाता के खून पसीने से अर्जित धन का इनके लिए क्या महत्व है।

 

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