समाज

दशकों तक भारत में अर्थशास्त्र का तात्पर्य गरीबी का अध्ययन रहा है। कुछ समय पहले तक कॉलेज में अर्थशास्त्र पढ़ाने की शुरुआत 'गरीबी के दोषपू्र्ण चक्र' नामक सिद्धांत (Theory of vicious circle of poverty) से की जाती थी। इस सिद्धांत के अनुसार गरीबी को दूर नहीं किया जा सकता। गरीब लोग तथा गरीब राष्ट्र के लिए गरीब रहना नियति है। वास्तव में यह कोरी बकवास है। यदि यह सत्य होता तो संसार आज भी पाषाण युग में होता। जीवनियों (biography) का इतिहास 'गरीबी से अमीरी का सफर' करने वाली कथाओं से भरा पड़ा है। हांगकांग और अमेरिका गरीब अप्रवासियों (immi

"सागर में समाकर अपनी पहचान खो बैठने वाली पानी की बूंद से इतर, मनुष्य समाज में रहकर भी अपनी पहचान नहीं खोता है।
मानव जीवन स्वतंत्र होता है। मनुष्य का जन्म केवल समाज की उन्नति के लिए नहीं बल्कि स्वयं की उन्नति के लिए होता है..."
 
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जो कुछ हो रहा है, भयावह है। लग रहा है जैसे सती-युग लौट आया है। चैनल खबर चला रहे हैं- संसद सदमे में। सदमे में तो हम हैं। स्त्री अब क्या करेगी, कैसे जिएगी, कैसे अपना मुंह सबको दिखाएगी- ये कैसे सवाल हैं? लोग रो रहे हैं, दुखी हैं, और कह रहे हैं अब तन ढकने से क्या, बेचारी का जो था सो तो सब लुट गया। इज्जत सरेआम रौंद डाली गई। अब तो बेचारी तिल-तिल कर घुट-घुट कर मरेगी। यह सब क्या है। यह कैसी सहानुभूति है, जो बलात्कार का शिकार हुई स्त्री को स्वाभाविक जीवन जीता देखना गवारा नही करती।

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राज्य सिर्फ व्यवस्था है ,फंकशनल है कि वह मुल्क में अव्यवस्था न होने दें । और राज्य इसलिए नहीं है कि स्वतंत्रता छीन ले ।राज्य इसलिए है कोई व्यक्ति  कोई व्यक्ति किसी की  स्वतंत्रता छीनने न पाए। राज्य इसलिए है कि एक व्यक्ति दूसरे के स्वतंत्रता के जीवन में बाधा न डाल पाए । लेकिन धीरे –धीरे राज्य को पता चला कि हम ही सारी स्वतंत्रता क्यों नहीं छीन लें। राजनीतिज्ञ सदा ही पूरी शक्ति पाने का आकांक्षी रहा है। लेकिन आज तक मनुष्य जाति के इतिहास में राजनीतिज्ञ कभी पूरी ताकत नहीं पा सका। अब समाजवाद के नाम से पा सकता है।