सब्सिडी

दुनिया आशावाद और निराशावाद में बंटी हुई है। आर्थिक आशावादियों का विश्वास है कि यदि सरकार बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में निवेश करे और उद्यमियों के समक्ष मौजूद बाधाओं को दूर करे तो बड़ी तादाद में नौकरियों के सृजन के साथ-साथ अर्थव्यवस्था का विकास संभव होगा। इससे कर राजस्व बढ़ेगा, जिसका निवेश गरीबों पर किया जा सकेगा। यदि कुछ दशक तक हम इस नीति का अनुकरण करें तो हमारा देश धीरे-धीरे मध्य वर्ग में तब्दील हो जाएगा। दूसरी ओर निराशावादियों की भी कुछ चिंताएं हैं, जिनमें असमानता, क्रोनी कैपिटलिज्म, पर्यावरण का क्षरण, शहरीकरण की बुराई आदि शामिल हैं। ये समस्

Author: 
गुरचरण दास

हाल में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी महंगाई की ही शिकायत कर रहा था। टीवी पर लोग आलू, प्याज, घी और दाल की कीमतें बताते नजर आते थे। हालांकि चुनावी पंडित हमेशा का चुनाव राग ही गा रहे थे, लेकिन कांग्रेस की हार में भ्रष्टाचार से ज्यादा महंगाई का हाथ रहा। हाल में महंगाई कुछ कम हुई हैं, लेकिन सभी दलों के लिए यह चेतावनी है कि आम आदमी महंगाई के दंश को भूलने वाला नहीं है और यह आगामी आम चुनाव में नजर आएगा।

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गुरचरण दास

देश का औद्योगिक परिदृश्य बेहद निराशाजनक है। नवंबर, 2013 के औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) के आंकड़े 2008-09 में आई वैश्विक मंदी जैसे चिंताजनक स्तर पर पहुंच गए हैं। ऐसे में, मौजूदा वित्त वर्ष के औद्योगिक उत्पादन में बहुत मजबूती की उम्मीद नहीं की जा सकती है। पिछले छह महीनों में खासकर महंगे उपभोक्ता सामान का उत्पादन घट जाने के चलते ही ऐसी स्थिति देखने को मिली है। अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम द्वारा जारी नई विश्व कारोबारी परिदृश्य रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कारोबार शुरू करने के लिए 12 प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, जबकि दक्षिण एशियाई देशो

एलपीजी के कई मायने निकलते हैं। यह लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस भी हो सकता है और लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन एवं ग्लोबलाइजेशन (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण) भी, जिसकी अक्सर वाम झुकाव वाले आलोचना करते हैं। इसका एक मतलब सरकार द्वारा आम लोगों की जिंदगी पर डाले गए डाके (लाइफ प्लंडर्ड बाइ गवर्नमेंट) से भी है, जो सरकारी हस्तक्षेप विरोधी भावनाओं से जुड़ा हुआ है। यह एहसास तथाकथित मध्यवर्ग में लगातार बढ़ रहा है। इसकी वजह पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती कीमतें व इनमें और वृद्धि का प्रस्ताव है।

नए वर्ष में देश के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की है। घटती आर्थिक विकास दर, बढ़ता राजकोषीय और चालू खाते का घाटा, लगातार चिंता का कारण बना हुआ है। यही नहीं, पिछले दिनों खुदरा मुद्रास्फीति की दर 14 महीने के उच्चतम स्तर तक पहुंच गई। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां ने भी आगाह किया है कि यदि समय रहते आर्थिक निर्णय नहीं लिए गए तो भारत की साख और गिर सकती है।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में मतदान हो जाने के बाद अब सारी लड़ाई राजस्थान और दिल्ली में केंद्रित हो गई है। इन दोनों राज्यों में मतदान की घड़ी करीब आने के साथ ही राजनीतिक दल एक-दूसरे पर बढ़त हासिल करने के लिए हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। राजस्थान और दिल्ली उन राज्यों में शामिल हैं जहां मुकाबला मुख्य रूप से कांग्रेस और भाजपा के बीच है। स्वाभाविक रूप से दोनों दलों के प्रमुख नेता एक के बाद एक चुनावी रैलियों को संबोधित कर रहे हैं और इस प्रकार की रैलियों को सफल दिखाने के लिए उनमें लोगों की भीड़ जुटाने के ल

वैश्विक गांव में तब्दील हो चुकी दुनिया के तमाम देश जहां वस्तुओं, सेवाओं व खाद्यान्नों की विनिमय प्रक्रिया को अपनाकर देश को प्रगति व देशवासियों को समृद्धि की ओर अग्रसर करने में जुटे हैं वहीं, आश्चर्यजनक रूप से हमारे देश के कुछ राजनैतिक दलों और उनके समर्थकों का अब भी मानना है कि बाजार का नियमन कर कीमतों को नियंत्रित किया जा सकता है। कम से कम पश्चिम बंगाल में आलू की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए राज्य सरकार द्वारा उठाये जा रहे कदम तो यही साबित करते हैं। ममता बनर्जी सरकार ने राज्य में आलू की लगातार बढ़ती कीमतों से निबटने के लिए कीमतों पर

टमाटर और प्याज समेत खाद्य पदार्थो की बेतहासा बढ़ती कीमतों को लेकर उपभोक्ता परेशान हैं, परंतु लोग भूल रहे हैं कि कुल मिलाकर कृषि उत्पादों का आयात-निर्यात उपभोक्ताओं के हित में है। देश में खाद्य तेल और दाल की उत्पादन लागत ज्यादा आती है। इनका भारी मात्र में आयात हो रहा है, जिनके कारण इनके दाम नियंत्रण में हैं। यदि हम विश्व बाजार से जुड़ते हैं तो हमें टमाटर, प्याज के दाम ज्यादा देने होंगे, जबकि तेल और दाल में राहत मिलेगी। मेरी समझ से उपभोक्ता के लिए तेल और दाल ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। अत: टमाटर और प्याज के ऊंचे दाम को वहन करना चाहिए।

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