सपने

इस बार चुनाव प्रचार के दौरान गुजरात न जा सकी। मेरी नई किताब हाल में छपी है और उस सिलसिले में इतनी मशरूफ रही हूं कि चुनाव देखने न जा सकी, बावजूद इसके कि मैं जानती हूं कि यह चुनाव 2014 का रिहर्सल है। न जा पाने की वजह से मैं अपने पत्रकार बंधुओं के लेखों पर निर्भर रही, जिनको पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि उन्होंने अब भी 2002 के दंगों के लिए नरेंद्र मोदी को माफ नहीं किया है। उनके लेख अखबारों में पढ़ने के बाद मैंने इंटरनेट पर मुख्य राजनेताओं के भाषण ध्यान से सुनने और इनका विश्लेषण विस्तार से करने के बाद इस निर्णय पर पहुंची हूं कि गुजरात में लड़ाई दो बिल्कुल अलग दृष्टिकोणों की है।