संसद

पिछले कुछ महीनों से देश में एक अजीब-सी मायूसी छा रही थी। महत्वपूर्ण नीतियों में विलंब, भ्रष्टाचार और लोकमत को अनदेखा करने की प्रवृत्ति से निराशा का माहौल बन गया था। लेकिन हताशा के ये बादल अब धीरे-धीरे हटते नजर आ रहे हैं। शुक्रिया उन नागरिकों का जिन्होंने जनहित में लड़ाई लड़ी। इसके अलावा माहौल में परिवर्तन में न्यायालय के निर्णयों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। इन्हीं की बदौलत राजनीतिक सुधारों के नागरिकों के प्रयास आंशिक रूप से ही सही, सफल हो पाए। आखिरकार जनता के दबाव और चुनावी राजनीति की मजबूरियों के कारण सरकार को अंतत: कार्रवाई करनी ही पड़ी।

राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ जारी अभियान अपने निर्णायक मोड़ पर है, लेकिन इसे अभी खत्म नहीं माना जा सकता। तब तो और नहीं, जब हमारे संसदीय लोकतंत्र की नैतिकता में लगातार गिरावट की चिंता स्पष्ट है और इस पर सार्वजनिक तौर पर चर्चा भी हो रही है। इस दिशा में सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला 10 जुलाई, 2013 को आया, जिसमें देश की सबसे बड़ी अदालत ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 (4) को निरस्त कर दिया। इसके तहत किसी भी मामले में दोषी और कम से कम दो साल की सजा पाए सांसद या विधायक की सदस्यता खत्म हो जाएगी। साथ ही, वह छह साल तक चुनाव लड़ने के अयोग्य होगा। इस फैसल

संसद का सत्र आरंभ होते ही नई दिल्ली का माहौल काफी सक्रिय और जोशपूर्ण हो जाता है। बावजूद इसके कि आजकल अधिकतर गतिविधियां संसद में नहीं, बल्कि संसद के बाहर पूरी की जाती हैं। इस बार के मानसून सत्र का अंतिम सप्ताह दो कारणों से महत्वपूर्ण था। पहला, कई वर्षो के गतिरोध के बाद भूमि अधिग्रहण एवं खाद्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विधेयक पारित हुए। दूसरा, वह मामले अधिक स्पष्ट दिखाई दिए जहां राजनीतिक दल आसानी से समझौता कायम कर सकते हैं। यहां मैं सूचना का अधिकार, संशोधन विधेयक, 2013 की बात कर रहा हूं। ज्यादातर लोगों का मानना है कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 एक ऐसा कारगर हथिया

केंद्रीय सरकार ने राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखने के लिए इस कानून में जरूरी बदलाव लाने का निर्णय अगस्त 1 को ले लिया। इससे पहले विभिन्न प्रमुख राजनीतिक दलों पर इस विषय पर आम सहमति बनती नजर आई थी कि उन्हें सूचना के अधिकार की जिम्मेदारी से मुक्त रखा जाए। इससे राजनीतिक दलों की पोल अच्छी तरह खुल गई है और देश के नागरिकों को पता चल गया है कि चाहे सत्ताधारी दल हो या विपक्षी दल, वे सभी अपने को पारदर्शिता से बचाना चाहते हैं। इससे पहले केंद्रीय सूचना आयोग ने इस बारे में तर्कसंगत फैसला दिया था कि सूचना के अधिकार के कानून के अंतर्गत सार्वजनिक प्राधिकर

विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय ने कांग्रेस एवं संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी की नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद छोड़कर राजनीतिक रूप से भी हलचल पैदा की है। वह इस परिषद में इसलिए काम करने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मनरेगा मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी की दर से वेतन दिए जाने की अनुशंसा को अस्वीकार कर दिया। ऐसा लगता है कि मनमोहन सरकार के प्रति उनकी नाराजगी कुछ ज्यादा ही है, क्योंकि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद से मुक्त होने के बाद उन्होंने केंद्रीय सत्ता पर यह आरोप भी मढ़ा कि वह आम लोगों को नजरअंदाज कर आर्थिक वृद्धि हासिल करने पर तुली ह

जब से भारतीयों विशेषकर खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश का विरोध कर रही राजनैतिक पार्टियों को पता चला है कि वालमार्ट ने भारत में एफडीआई को मंजूरी देने के प्रति सहमति कायम कराने के लिए ‘लॉबिंग’ के मद में सवा सौ करोड़ रूपए की भारी भरकम धनराशि खर्च की है, उनकी भृकुटि तन गई है। एफडीआई के मुद्दे पर लोकसभा में वोटिंग के दौरान हुई हार से तिलमिलाए राजनैतिक दलों को जैसे सरकार को गलत और खुद को सही साबित करने का एक बड़ा मौका मिल गया। मुख्य विपक्षी दल सहित अन्य दलों ने जिस प्रकार लॉबिंग पर हाय तौबा मचाना शुरू किया और संसद की कार्रवाई में गतिरोध पैदा किया वह उनकी अधीरता

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