संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन

लकड़ी चाहे कितनी ही मजबूत क्यों न हो, अगर उसमें घुन लग जाए तो अच्छी भली मजबूत लकड़ी भी खोखली हो जाती है। भारतीय लोकतंत्र के लिए सब्सिडी भी किसी घुन की तरह ही है। ऊपर से सब्सिडी भले हानिकारक न दिख रही हो, लेकिन वास्तविकता यही है कि यह लोकतंत्र को खोखला कर रही है। सब्सिडी को जिस तबके के लिए फायदेमंद बताया जाता है, यह उस तबके का भला नहीं करती। यह तो बिचौलियों के लिए मलाई जैसी होती है। सब्सिडी जन कल्याण का छलावा भर है। भारत में लोगों को लगता है कि यहां जो सब्सिडी की व्यवस्था लागू है, वह गरीबों की हितैषी है, जबकि हकीकत यह है कि सरकार जितना सब्सिडी देती है, उससे ज्यादा राशि गरी

राजकोषिय घाटे को कम करने के उपाय के तहत किसी भी सरकार की निगाह सबसे पहले पेट्रोलियम पदार्थों पर दी जाने वाली भारी भरकम सब्सिडी पर ही केंद्रीत होती है। राष्ट्रीय आय को बढ़ाने में असफल सरकारें अपने घाटे को कम करने के लिए सबसे पहले सब्सिडी को ही घटाने का फैसला लेती हैं। कभी अंतराष्ट्रीय कीमतों का हवाला देकर तो कभी पेट्रोलियम कंपनियों को होने वाले नुकसान की बात कह सब्सिडी घटाने का काम किया जाता है। हालांकि थोड़ा-थोड़ा कर सब्सिडी घटाने का फायदा न तो अर्थव्यवस्था को मिल पाता है ना ही जनता को हमेशा के लिए इससे मुक्ति। और तो और कालाबाजारियों को लूट खसोट करने और पैसा बनाने का मौका