व्यवस्था

संस्कृति का प्रभाव होता है या व्यवस्था का यह तय करने के लिए किसी समाजशास्त्रीय ,मनोविज्ञानीय,समाजशास्त्रीय या अर्थशास्त्रीय सिद्धांत को स्थापित कर पाना मुश्किल है। यह कह पाना मुश्किल है कि संस्कृति या व्यवस्था लोगों जिनमें शासक और शासित दोनों ही शामिल है की रोजमर्रा की गतिविधियों को किस हद तक प्रभावित करती है। संस्कृति और व्यवस्था दोनों ही गतिशील होते हैं।वे लगातार विकसित होते हैं,अंतर्क्रिया करते हैं ।दोनों ही मानवीय कर्म की उपज हैं । व्यवस्था उन लोगों की संस्कृति से प्रभावित होती है जो उसे बनाते हैं। लेकिन व्यवस्था भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि किस तरह की संस्कृति व

हाल ही में मदर टेरेसा के निधन ने सारे विश्व का ध्यान कलकत्ता और आमतौर पर भारत की  दारुण गरीबी की ओर आकर्षित किया। मदर टेरेसा ने  बेहद गरीब देश के सबसे गरीब  लोगों की सेवा की । जिस देश में संन्यास,भौतिकवाद का विरोध और भाग्यवाद वहां के बहुसख्यकों के धर्म हिन्दू का अपरिहार्य अंग हैं।जो लोग इन सिद्धांतो का अनुकरण करते है  उनके लिए गरीबो की आर्थिक स्थिति को बदलने की कोशिश फिजूल है। उनके लिए गरीबी नहीं वरन समृद्धि अचरज का विषय है।

भ्रष्टाचार को लेकर मध्य वर्ग और युवाओं में भारी आक्रोश है। इससे आज देश का एक बड़ा जनमानस प्रभावित और परेशान है. इसलिए भ्रष्टाचार को लेकर लड़ाई लड़ रही सिविल सोसाइटी की मांगों के प्रति सरकार का टकरावपूर्ण रवैया किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह सरकार की हठधर्मिता का परिचायक है. यह संसदीय लोक प्रक्रिया की दृष्टि से भी हटकर है. देश के प्रत्येक नागरिक को संविधान ने यह अधिकार दिया है कि वह न केवल अपनी मांगें कर सकता है, बल्कि इससे संबंधित प्रस्ताव अथवा बिल सरकार के पास विचारार्थ प्रस्तुत कर सकता है. इस प्रस्ताव अथवा बिल को मानना या न मानना सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है और वह चाहे तो इसे संसद में रखे अथवा न रखे?