वैश्विकरण

एलपीजी के कई मायने निकलते हैं। यह लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस भी हो सकता है और लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन एवं ग्लोबलाइजेशन (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण) भी, जिसकी अक्सर वाम झुकाव वाले आलोचना करते हैं। इसका एक मतलब सरकार द्वारा आम लोगों की जिंदगी पर डाले गए डाके (लाइफ प्लंडर्ड बाइ गवर्नमेंट) से भी है, जो सरकारी हस्तक्षेप विरोधी भावनाओं से जुड़ा हुआ है। यह एहसास तथाकथित मध्यवर्ग में लगातार बढ़ रहा है। इसकी वजह पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती कीमतें व इनमें और वृद्धि का प्रस्ताव है।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हुए कहा है कि देश का बाजार दुनिया के लिए हमने खोला है। उनकी बात सही है। देश सचमुच आज दुनिया का बाजार बन गया है, लेकिन दुनिया के बाजार में हम कहां हैं?

यह सोचकर कितना अजीब लगता है कि देश में कुछ वर्ष पूर्व (लगभग एक दशक) पहले तक यदि किसी को टेलीफोन कनेक्शन लेना होता था तो उसे कितने पापड़ बेलने पड़ते थे। टेलीफोन के लिए आवेदन फार्म हासिल करने से लेकर भरे आवेदन पत्र भरकर जमा कराने, अपने नंबर का इंतजार करने, घर में फोन लग जाने में दो से तीन साल तक लग जाया करते थे। इतना ही नहीं दो-तीन साल बाद भी नंबर तब आता था जब फार्म देने वाले बाबू से लेकर अधिकारी तक की मुट्ठी गर्म नहीं की जाती थी। इसके बाद भी जबतक कुछ बड़े प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर रसूखदार लोगों के पत्र आप की सिफारिश करते विभाग तक न पहुंचे थे, तबतक घर में फोन की घंटी बजन

केंद्र सरकार के एक कार्यसमूह द्वारा देश के डाक सेवा क्षेत्र में बेहतर परिणाम के लिए डाक विभाग के एकाधिकार को समाप्त करने का सुझाव दिया गया है। डाक क्षेत्र में सेवा की गुणवत्ता बढ़ाने के संदर्भ में कार्यसमूह द्वारा दिया गया यह सुझाव कई मायनों में स्वागत योग्य है। कार्य समूह की इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को और बढ़ाने और डाक विभाग के एकाधिकार को खत्म करने की सिफारिश इसलिए भी सराहनीय है क्योंकि इस संदर्भ में जो कानून चला आ रहा है वह अंग्रेजी शासन काल का है और ११० साल से भी अधिक पुराना है। वैश्विकरण के दौर में यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि सेवा के किसी क्षेत्र में वांछनीय गुणवत्