विश्व बैंक

पिछले सप्ताह विश्व बैंक ने विश्व में गरीबी की स्थिति पर एक रिपोर्ट जारी की। मनुष्य होने के नाते इस दस्तावेज को पढ़ना आनंददायी रहा, क्योंकि इससे पता लगता है कि कितनी तेजी से हर जगह भीषण गरीबी कम हो रही है। लेकिन, भारत के नागरिक के रूप में रिपोर्ट को पढ़ना निराशाजनक रहा। इसके कारणों पर हम आगे चर्चा करेंगे। पहले अच्छी खबर पर बात करें। 1981 में 1.9 अरब लोग भीषण गरीबी की स्थिति में रह रहे थे, मतलब यह कि प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति खर्च बमुश्किल ३क् रुपए था। लेकिन 2010 तक बेहद गरीब लोगों की संख्या घटकर 1.2 अरब रह गई।  

जब वित्तमंत्री पी. चिदंबरम 28 फरवरी को संप्रग-2 का आखिरी बजट पेश करने के लिए उठे थे तो लोग यह कल्पना रहे थे कि वह सब्सिडी और वोट के लिए कुछ और लोक-लुभावन योजनाओं की शुरुआत करने की कोशिश करेंगे। ऐसा नहीं हुआ। यह जिम्मेदार बजट निकला, जिसने राजस्व घाटे को 4.8 प्रतिशत पर रोकने का संकल्प व्यक्त किया। विडंबना यह रही कि यह उन अपेक्षाओं के लिहाज से अपर्याप्त रहा जो भारत की उच्च विकास दर के संदर्भ में की जा रही थीं।

Author: 
गुरचरण दास