वालमार्ट

खुदरा व्यापार में 51 फीसदी विदेशी निवेश के मुद्दे पर ‘संसद से सड़क तक’ घमासान छिड़ने और काफी जद्दोजहद के बाद नियम 184 के तहत संसद में बहस और वोटिंग के बाद विदेशी खिलाड़ियों के लिए देश में रिटेल स्टोर खोलने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि विदेशी निवेश के नफा-नुकसान को लेकर लोगों के मन में अब भी संशय बना हुआ है। उधर, वॉलमार्ट द्वारा भारत में विदेशी निवेश के पक्ष में समर्थन हासिल करने के लिए की गई लॉबिंग और इस मद में खर्चे गए सवा सौ करोड़ रुपए की भारी भरकम राशि ने एक नए बहस को हवा दे दी है। एफडीआई के इन्हीं मसलों पर भारत के पहले उदारवादी वे

Author: 
आलोक पुराणिक

जब से भारतीयों विशेषकर खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश का विरोध कर रही राजनैतिक पार्टियों को पता चला है कि वालमार्ट ने भारत में एफडीआई को मंजूरी देने के प्रति सहमति कायम कराने के लिए ‘लॉबिंग’ के मद में सवा सौ करोड़ रूपए की भारी भरकम धनराशि खर्च की है, उनकी भृकुटि तन गई है। एफडीआई के मुद्दे पर लोकसभा में वोटिंग के दौरान हुई हार से तिलमिलाए राजनैतिक दलों को जैसे सरकार को गलत और खुद को सही साबित करने का एक बड़ा मौका मिल गया। मुख्य विपक्षी दल सहित अन्य दलों ने जिस प्रकार लॉबिंग पर हाय तौबा मचाना शुरू किया और संसद की कार्रवाई में गतिरोध पैदा किया वह उनकी अधीरता

बहु ब्रांड खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) विकास का रास्ता है जिसके माध्यम से सरकार छोटे दुकानदारों, कारोबारियों, किसानों और युवाओं के हितों का पोषण करना चाहती है।

विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ऐसे भावुक भाषण देती हैं, मानो इस निर्णय से सब कुछ समाप्त हो जाएगा। लेकिन इसमें कोई सच्चाई नहीं है। विपक्ष का ध्यान कुर्सी पर, हमारा जनता क भलाई पर है। शर्म की बात है कि सुषमा जी सूदखोरों का समर्थन कर रही हैं।

मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश की इजाजत के बाद बवंडर सा मचा हुआ है। इंश्योरेंस सेक्टर में विदेशी निवेश की सीमा 26 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत होने पर अलग बवाल है। दो एकदम विपरीत ध्रुवों की राय सामने आ रही है। सरकारी पक्ष कह रहा है कि विदेशी निवेश आने से रोजगार बढ़ जायेगा, उपभोक्ताओं का भला होगा। कोल्ड स्टोरेज बनेंगे। फल अन्न की बरबादी रुकेगी। सरकार विरोधी पक्ष का कहना है कि भारत तबाह हो जायेगा, रोजगार खत्म हो जायेंगे। उपभोक्ता लुट जायेंगे। दोनों ही अतिवादी दृष्टिकोण हैं, रास्ता कहीं बीच से होकर जाता है।

Author: 
आलोक पुराणिक

आर्थिक सुधारों के मद्देनजर एफडीआइ के फैसले ने विपक्ष को भले आक्रामक किया हो, लेकिन सरकार ने भी यह तय कर लिया है कि नहीं झुकेगी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी साफ कह दिया है कि देश को वे 1991 की स्थिति में नहीं ले जाना चाहते। उनके इस बयान से सरकार का आत्मविश्वास भी झलक रहा है। तमाम विरोधों के बीच सरकार के बढ़ते कदम यह बताने के लिए काफी हैं कि उसके ऊपर इन विरोधों का कोई असर नहीं होने वाला। आर्थिक सुधार लागू करने के लिए सरकार तटस्थ है और वह करके रहेगी। जानकारों की मानें तो सरकार अभी और कई नए फैसले लेने वाली है, जो देश को हतप्रभ कर सकता है। रिटेल में एफडीआइ को मंजूरी दिए जान