रोजगार गारंटी योजना

दिल्ली में भाजपा की हार के बाद मोदी सरकार राजनीतिक साहस की कमी से जूझ रही है। इसलिए सरकार में यह साहस नहीं रहा कि वह मनरेगा जैसी नाकाम रोजगार योजनाओं को बंद कर सके। भाजपा को डर है कि अगर उसने इस तरह की योजनाओं को बंद किया तो उन्हें गरीब विरोधी करार दे दिया जाएगा।

केंद्र सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा कानून को लोकसभा और राज्यसभा में पारित करा लेने के साथ अर्थव्यवस्था में कोहराम मचा है। यह ठीक ही है। सरकार के पास वर्तमान खर्च को पोषित करने के लिए राजस्व नहीं हैं। ऋण के बोझ से सरकार दबी जा रही है। वर्तमान में केंद्र सरकार का कुल खर्च लगभग 12 लाख करोड़ रुपये है, जबकि आय मात्र सात लाख करोड़ रुपये। लगभग आधे खर्चे को ऋण लेकर पोषित किया जा रहा है। ऐसे में खाद्य सुरक्षा कानून का लगभग 1.3 लाख करोड़ रुपये प्रतिवर्ष का बोझ अपने सिर पर लेना अनुचित दिखता है। फिर भी गरीबों को राहत देने के इस प्रयास का समर्थन करना चाहिए।

मनरेगा को लेकर कैग ने जो कुछ कहा है वह वाकई चौंकाने वाला है। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक इस स्कीम में 13 हजार करोड़ रूपए की धांधली हुई है और इसका लाभ भी जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच सका है। यूपीए सरकार अपनी उपलब्धियों में इसे सबसे उपर रखती है। कुछ समय पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसकी जमकर तारीफ की थी और कहा था कि इससे दूसरी हरित क्रांति आ सकती है। जाहिर है, कैग की इस रिपोर्ट से यूपीए सरकार को धक्का लगेगा। वह यह कहकर अपना बचाव करने की कोशिश करेगी कि इस स्कीम को अमल में लाने की वास्तविक जवाबदेही राज्य सरकारों की है, मगर कैग की रिपोर्ट में केंद्र की भी आलोचना