रैली

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में मतदान हो जाने के बाद अब सारी लड़ाई राजस्थान और दिल्ली में केंद्रित हो गई है। इन दोनों राज्यों में मतदान की घड़ी करीब आने के साथ ही राजनीतिक दल एक-दूसरे पर बढ़त हासिल करने के लिए हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। राजस्थान और दिल्ली उन राज्यों में शामिल हैं जहां मुकाबला मुख्य रूप से कांग्रेस और भाजपा के बीच है। स्वाभाविक रूप से दोनों दलों के प्रमुख नेता एक के बाद एक चुनावी रैलियों को संबोधित कर रहे हैं और इस प्रकार की रैलियों को सफल दिखाने के लिए उनमें लोगों की भीड़ जुटाने के ल

बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार और कांग्रेस एक दूजे की ओर तक रहे हैं। चिदंबरम बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए मानकों में कुछ बदलाव करने का भरोसा दे चुके हैं, जिसकी मांग नीतीश लंबे समय से करते रहे हैं। 17 मार्च को नीतीश ने रामलीला मैदान में अपनी रैली में एक बार फिर यह मांग उठाई। नीतीश कुमार लोकसभा चुनावों में विशेष राज्य के दर्जे की उपलब्धि को भुनाना चाहते हैं। निश्चित रूप से वह इतने भोले नहीं हैं जो यह मानकर चल रहे हों कि यह दर्जा बिहार का कायाकल्प कर देगा और निकट भविष्य में बिहार आर्थिक पिछड़ेपन से उबर जाएगा।

दिल्ली में आए दिन रैलियां होती रहती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि दिल्ली और रैलियों का चोली दामन का साथ है। हर पार्टी और संगठन दिल्ली में विशाल  रैली कर लाखों की भीड़ जुटाना चाहता है  ताकि सारे देशभर  में उसका संदेश पहुंचे। इस नजरिये से पिछले 4 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई कांग्रेस की  रैली ऐतिहासिक थी। ऐतिहासिक इसलिए क्योंकि पहली बार किसी राजनीतिक पार्टी ने आर्थिक सुधारों और खासकर खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के समर्थन में इतनी विशाल रैली की । उसके पक्ष में भारी जनसमर्थन  जुटाने की कोशिश की।आप कह सकते हैं कि इसमें क्या खास बात