राजनीति

देश-विदेश में तमाम आलोचना के बाद संप्रग सरकार ने आखिरकार अपनी दूसरी पारी में बड़े आर्थिक सुधारों की शुरुआत करने का साहस दिखाया। मनमोहन सिंह सरकार की ओर से यह साहस तब दिखाया गया जब देश में आर्थिक प्रगति की रफ्तार लगातार घटती जा रही है और इसके चलते विश्व में भारत की साख भी प्रभावित हो रही है। पिछले दिनों योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने जब सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में वृद्धि दर महज पांच फीसदी ही रहने की संभावना व्यक्त की थी तभी यह महसूस किया जाने लगा था कि बड़े आर्थिक सुधारों में देरी बहुत भारी पड़ने जा रही है। सरकार के पास इसके अलावा अन्य कोई

जानकारी के मुताबिक पिछले पांच वर्षों के दौरान भारतीय कंपनियों ने छह बड़े राजनीतिक दलों को 4,400 करोड़ रुपये से अधिक धनराशि दान में दी है। इन दलों के नाम हैं- कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा), माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा), समाजवादी पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा)। भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा जुटाए गए ये आंकड़े टाइम्स ऑफ इंडिया समाचार पत्र द्वारा प्रकाशित किए गए हैं। राजनीतिक दलों को जिस पैमाने पर धन की आवश्यकता होती है उस लिहाज से देखा जाए तो यह धनराशि काफी कम प्रतीत होती है। लेकिन यह याद रखना होगा कि कारोबारी घरानों द

सेंटर फार सिविल सोसायटी ने आज नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में सांसदों के लिए पालिसी फोरम का आयोजन किया जिसमें वैकल्पिक सेवा प्रदाता तंत्र (Alternative Service Delivery Mechanisms) पर चर्चा हुई। चर्चा से पहले विश्व बैंक के सलाहकार और कोलंबिया विश्वविद्यालय में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर डा.अरविंद पाणिग्रही नें संक्षेप में विषय की प्रस्तावना रखी।

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अभी पांच विधानसभाओं के चुनाव हुए लेकिन एक भी नारा ऐसा नहीं सुनाई दिया जो याद रह जाए जनता को रोमांचित कर  दे। लगा कि चुनावों में वह मजा नहीं रहा। बिना नारों का चुनाव भी क्या चुनाव हुआ भला। चुनावों में  नारों का महत्व अपरंपार है । बिना नारे के तो चुनाव ऐसे बेमजा लगता है जैसे बिना नमक की सब्जी। असल में चुनाव में नारे ही माहौल बनाते हैं। नारे ही पार्टियों के चुनाव अभियान में दम और कार्यकर्ताओं में जोश भरने का काम करते हैं। कभी–कभी तो नारे ही चुनाव जीता भी देते हैं जैसे गरीबी हटाओं का नारा था। इसलिए हर पार्टी एक ऐसा नारा अपने लिए चाहती है जिससे वह वोटरों का दिल जीत स

अगर आप अक्सर रेल यात्रा करते हैं और आपको आपनी जान प्यारी है तो अगली बार आपको रेल में यात्रा करने से पहले दस बार सोचना चाहिए। कम से कम  अनिल काकोडकर समिति की रेलवे सुरक्षितता के बारे में आई रपट के बाद तो आपको चौकन्ना हो ही जाना चाहिए। एक तरह से रेल मंत्रालय के खिलाफ आरोपपत्र है यह रपट कि वह किस तरह रेलयात्रियों की जान के साथ खिलवाड कर रहा है। खराब और दोषपूर्ण रेलवे ट्रेक ,असुरक्षित खस्ताहाल कोच, बरसों पुराने रेलवे पुल,लिकिंग ब्रेक - यह हालत है रेलवे की सुरक्षितता की । तभी तो पचास प्रतिशत ट्रेन दु्र्घटनाएं पटरी से उतरने के कारण होती है तो 36 प्रतिशत अनमैन्ड लेवल क्रासि

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