राजनीति

 

- अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के दिन रेहड़ी-पटरी व फेरी वालों के लिए मित्रवत व सुविधाजनक कानून बनाने की मांग पर बोले कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष

- समस्या के समाधान के लिए सियासतदारों पर निर्भर न रहने की दी सलाह

भारत और चीन के बीच तुलना करने का चलन एक अर्से से पूरी दुनिया में चल रहा है। कई मामलों में भारत को चीन से शिक्षा लेने को कहा जाता है, कुछ में चीन को भी भारत से सीखने की सलाह दी जाती है। लेकिन हाल में लिए गए चीन सरकार के सबसे बड़े प्रशासनिक फैसले से कुछ सीखने की हिम्मत क्या भारत सरकार कभी जुटा पाएगी?

छह महीने पहले सरकार निराशा और पंगुता की शिकार नजर आ रही थी। लगता था कि यह किसी को भी (खासकर ममता बनर्जी को) नाराज करने की हिम्मत कभी नहीं जुटा पाएगी। लेकिन जब से चिदंबरम वित्तमंत्री बने हैं तब से सरकार किसी ऐसे सुधारवादी कार्यकर्ता जैसी लग रही है, जो किसी भी सूरत में अपने लक्ष्य से कम किसी भी चीज पर राजी नहीं होने वाला। संसद में हार का खतरा उठाकर भी मल्टीब्रांड रिटेल का मामला आगे बढ़ाया गया। रेल के किराये बढ़ा दिए गए और डीजल की कीमतें हर महीने बढ़ाई जा रही हैं- तब तक जब तक इस पर दी जाने वाली सब्सिडी से निजात नहीं पा ली जाती। एलपीजी गैस सिलिंडरों पर एक ऊपरी सीमा लागू कर दी

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर बहस अंततः समाप्त हो गई। उम्मीद है कि अब इसने उन अन्य गरमागरम बहसों की आत्माओं के बीच अपनी शांतिपूर्ण जगह बना ली होगी, जिनसे हमारा लोकतांत्रिक देश यदा कदा गुजरता रहता है। हर समय लगता है मानो यह हमारे जीवन मरण का मुद्दा हो और हम विनाश के कगार पर खड़ें हों। अगर आप उनमें से हैं, जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के विरोधियों द्वारा की गई बर्बादी की भविष्यवाणियों से डरते हैं तो यहां प्रस्तुत है इसी तरह की पहले हुई कुछ बहसों का छोटा सा इतिहास। यह बताने के लिए कि लाखों भारतीय नौकरी से निकालकर फेंक नहीं दिए जाएंगे। और भारत वॉलमार्ट या टेस्को का उपनिवेश

उम्मीद है कि ज्यादातर सुधारवादी नए रेल मंत्री पवन कुमार बंसल की प्रशंसा करने से नहीं चूकेंगे। रेल भवन में पदभार संभालने के बाद पहले ही दिन बंसल ने यात्री भाड़ा बढ़ाने की पैरवी की और कहा कि इसके बिना भारतीय रेल वित्तीय संकट में घिर जाएगी।

टीम केजरीवाल और मीडिया के नितिन गडकरी पर लगे आरोपों से भारत की राजनीति का एक यर्थाथ उभरता है। उनसे उत्तर और दक्षिण की राजनीति का फर्क दिखा है। उत्तर भारत के नेता सिर्फ राजनीति करते हैं। ऐसा नहीं है कि वे भ्रष्टाचार में शामिल नहीं होते हैं। लेकिन एक बुनियादी फर्क यह है कि वे अपना बिजनेस नहीं खड़ा करते। उनके परिजन भी आमतौर पर कारोबारी गतिविधियों से दूर रहते हैं। वे अपने रिश्तेदारों को राजनीति में ही आगे बढ़ाते हैं।

डा मनमोहन सिंह का इरादा अटल हैं। तभी आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया जारी है। सुधार होंगे और उनसे सरकार पीछे नहीं हटेगी, इस बात को डा मनमोहन सिंह ने न केवल दोहराया है, बल्कि वे कैबिनेट से फैसले भी करवा रहे हैं। माना जा सकता है कि डा मनमोहन सिंह अब सचमुच आर-पार के मूड में हैं। वे जो चाहेगें करेगें। वे सोनिया गांधी से नहीं पूछेगें। उन्होंने कांग्रेस कार्यसमिति या यूपीए की समन्वयन समिति से मंजूरी नहीं ली। उलटे उन्होंने जो किया, उस पर दोनों ने मोहर लगाई। डा मनमोहन सिंह की राजनैतिक इच्छा अब निर्णायक है। इससे कांग्रेस और यूपीए के नेता परेशान हैं तो जयराम रमेश जैसे मंत्री भी।

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