राजनीति

टमाटर और प्याज समेत खाद्य पदार्थो की बेतहासा बढ़ती कीमतों को लेकर उपभोक्ता परेशान हैं, परंतु लोग भूल रहे हैं कि कुल मिलाकर कृषि उत्पादों का आयात-निर्यात उपभोक्ताओं के हित में है। देश में खाद्य तेल और दाल की उत्पादन लागत ज्यादा आती है। इनका भारी मात्र में आयात हो रहा है, जिनके कारण इनके दाम नियंत्रण में हैं। यदि हम विश्व बाजार से जुड़ते हैं तो हमें टमाटर, प्याज के दाम ज्यादा देने होंगे, जबकि तेल और दाल में राहत मिलेगी। मेरी समझ से उपभोक्ता के लिए तेल और दाल ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। अत: टमाटर और प्याज के ऊंचे दाम को वहन करना चाहिए।

पिछले कुछ महीनों से देश में एक अजीब-सी मायूसी छा रही थी। महत्वपूर्ण नीतियों में विलंब, भ्रष्टाचार और लोकमत को अनदेखा करने की प्रवृत्ति से निराशा का माहौल बन गया था। लेकिन हताशा के ये बादल अब धीरे-धीरे हटते नजर आ रहे हैं। शुक्रिया उन नागरिकों का जिन्होंने जनहित में लड़ाई लड़ी। इसके अलावा माहौल में परिवर्तन में न्यायालय के निर्णयों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। इन्हीं की बदौलत राजनीतिक सुधारों के नागरिकों के प्रयास आंशिक रूप से ही सही, सफल हो पाए। आखिरकार जनता के दबाव और चुनावी राजनीति की मजबूरियों के कारण सरकार को अंतत: कार्रवाई करनी ही पड़ी।

राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ जारी अभियान अपने निर्णायक मोड़ पर है, लेकिन इसे अभी खत्म नहीं माना जा सकता। तब तो और नहीं, जब हमारे संसदीय लोकतंत्र की नैतिकता में लगातार गिरावट की चिंता स्पष्ट है और इस पर सार्वजनिक तौर पर चर्चा भी हो रही है। इस दिशा में सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला 10 जुलाई, 2013 को आया, जिसमें देश की सबसे बड़ी अदालत ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 (4) को निरस्त कर दिया। इसके तहत किसी भी मामले में दोषी और कम से कम दो साल की सजा पाए सांसद या विधायक की सदस्यता खत्म हो जाएगी। साथ ही, वह छह साल तक चुनाव लड़ने के अयोग्य होगा। इस फैसल

जुलाई में अपराधियों को विधायी सदनों में प्रवेश करने से प्रतिबंधित करने का निर्णय सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट ने असंवेदनशील राजनीतिक वर्ग को एक और तगड़ा झटका दिया है। इस बार उसने लंबे इंतजार के बाद मतदाताओं को एक ऐसा अधिकार दे दिया जिसकी मदद से वे राजनीतिक दलों की मनमानी का मुंहतोड़ जवाब दे सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मतदाताओं को चुनाव में उतरने वाले सभी प्रत्याशियों को खारिज करने का विकल्प देकर चुनाव सुधार की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। इस फैसले के बाद अब मतदाताओं को ‘इनमें से कोई नहीं’ बटन दबाने का विकल्प मिलेगा। अपने आदेश में शीर्ष अदाल

तेलंगाना के गठन के फैसले के साथ हमने जो शुरू किया है, वह इतना  खतरनाक है कि यदि इसे अभी नहीं रोका गया तो हम आने वाले वक्त में बहुत पछताएंगे। धमकाकर नया राज्य बनाने के लिए मजबूर करने की कोशिश के नतीजे अच्छे नहीं होंगे।
राजनीति को पैसे से बाहर करने का एक ही तरीका है और वह है, राजनीति को पैसा बनाने के काम से बाहर कर दिया जाए... (बड़े आकार में देखने के लिए कार्टून पर क्लिक करें...)   - रिचर्ड एम. साल्समैन
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गांवों में मोबाइल गवर्नेंस की जरूरत

तेईस साल की राखी पालीवाल राजस्थान के राजसमंद जिले में उपली-ओदेन पंचायत की उप-प्रमुख हैं। वह एकमात्र निर्वाचित महिला सदस्य हैं, जो बाइक चलाती हैं। सुबह चार बजे उठकर खुले में शौच के खिलाफ महिलाओं को सलाह देती हैं। दिन में लॉ स्कूल जाती हैं और स्मार्ट फोन से फेसबुक अपडेट करती हैं।

 

राजनीति, क्रिकेट सहित विभिन्न क्षेत्रों में सुधार के लिए निंदा अभियान चलाने की बजाय ईमानदारी से प्रयास करने की जरूरत। हर मोड़ पर जरूरी सरकारी अनुमति की एवज में हमारे सभी दलों ने जब भी मौका मिला, आगे बढ़ने को आतुर उद्योग जगत की बांहें मरोड़ीं और अपने दलीय तथा निजी कोषों को भरने के लिए धन दुहा है।

पिछले छह वर्षों में खेत मजदूरों की मजदूरी काफी तेजी से बढ़ी है और इसके बढ़ने की रफ्तार चीजों की कीमतें बढ़ने की रफ्तार से ज्यादा रही है। इसका नतीजा ग्रामीण मजदूरों का जीवन स्तर सुधरने रूप में दिखाई पड़ा है। 2007-08 से लेकर अबतक देश के इस सर्वाधिक विपन्न तबके की आय में 6.8 प्रतिशत की वास्तविक सालाना बढ़त दर्ज की गई है। इस शानदार रुझान के पीछे क्या है?

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