योजना

देश के तमाम शहरों की सड़कें न सिर्फ लाखों कामगार गरीबों तथा अभावग्रस्त लोगों की आश्रयस्थली वरन उनकी रोजीरोटी का केंद्र भी हैं, जहां पर वे सस्ते और आकर्षक सामानों की दुकान सजाते हैं। शहरों में सड़क किनारे फुटपाथ पर आपकों ऐसे अनेक पुरष-महिलाएं पकाया हुआ भोजन, फल व सब्जियां, कपड़े, खिलौने, किताबें, घरेलू इस्तेमाल की चीजें व सजावटी सामान बेचते मिल जाएंगे। एक अनुमान के मुताबिक भारत में तकरीबन एक करोड़ लोग इस तरह सड़क किनारे सामान बेचते हुए अपनी आजीविका कमाते हैं।

द्वितीय पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत जो दूसरी बात सबसे अधिक परेशान करने वाली है वह यह कि बड़े-बड़े उद्योगों को आवश्यकता से अधिक महत्व तथा प्रमुखता प्रदान की गई है। सभी प्रगतिशील तथा उद्योग प्रधान देशों के विकास का क्रम यह रहा है कि उन्होंने सर्वप्रथम उपभोक्ता-सामग्री निर्माण करने वाले कारखानों की स्थापना की। उपभोक्ता-सामग्री के अन्तर्गत आते हैं कपड़ा, जूते, श्रृंगार-सामग्री तथा अन्य जीवनोपयोगी वस्तुएं। तत्पश्चात उन्होंने उन मशीनों का निर्माण किया जिनके द्वारा दैनंदिन जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन करने वाली मशीनों का निर्माण हो सकता था। भारत की द्वितीय पंचवर्षीय योज

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