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दुनिया आशावाद और निराशावाद में बंटी हुई है। आर्थिक आशावादियों का विश्वास है कि यदि सरकार बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में निवेश करे और उद्यमियों के समक्ष मौजूद बाधाओं को दूर करे तो बड़ी तादाद में नौकरियों के सृजन के साथ-साथ अर्थव्यवस्था का विकास संभव होगा। इससे कर राजस्व बढ़ेगा, जिसका निवेश गरीबों पर किया जा सकेगा। यदि कुछ दशक तक हम इस नीति का अनुकरण करें तो हमारा देश धीरे-धीरे मध्य वर्ग में तब्दील हो जाएगा। दूसरी ओर निराशावादियों की भी कुछ चिंताएं हैं, जिनमें असमानता, क्रोनी कैपिटलिज्म, पर्यावरण का क्षरण, शहरीकरण की बुराई आदि शामिल हैं। ये समस्

Author: 
गुरचरण दास

 

कांग्रेस कार्यकर्ताओं के कहर का शिकार हुआ एक रेस्तरां। आम से खास तक केंद्र सरकार में हो रहे रोज-रोज घोटाले और तमाम टैक्स से त्रस्त है। सभी लोग अलग अलग तरीके से अपना गुस्सा व्यक्त कर रहे हैं। लेकिन मुंबई में एक रेस्तरां के मालिक ने अपने रेस्तरां के बिल को ही गुस्सा व्यक्त करने का जरिया बना डाला। फिर क्या था, कांग्रेसी कार्यकर्ता उग्र हुए और रेस्तरां बंद करा दिया। बंद होते ही रेस्तरां मालिक की अक्ल खुली और विरोध के इस साधन को कहा-बाय, बाय।

जब वित्तमंत्री पी. चिदंबरम 28 फरवरी को संप्रग-2 का आखिरी बजट पेश करने के लिए उठे थे तो लोग यह कल्पना रहे थे कि वह सब्सिडी और वोट के लिए कुछ और लोक-लुभावन योजनाओं की शुरुआत करने की कोशिश करेंगे। ऐसा नहीं हुआ। यह जिम्मेदार बजट निकला, जिसने राजस्व घाटे को 4.8 प्रतिशत पर रोकने का संकल्प व्यक्त किया। विडंबना यह रही कि यह उन अपेक्षाओं के लिहाज से अपर्याप्त रहा जो भारत की उच्च विकास दर के संदर्भ में की जा रही थीं।

Author: 
गुरचरण दास

लकड़ी चाहे कितनी ही मजबूत क्यों न हो, अगर उसमें घुन लग जाए तो अच्छी भली मजबूत लकड़ी भी खोखली हो जाती है। भारतीय लोकतंत्र के लिए सब्सिडी भी किसी घुन की तरह ही है। ऊपर से सब्सिडी भले हानिकारक न दिख रही हो, लेकिन वास्तविकता यही है कि यह लोकतंत्र को खोखला कर रही है। सब्सिडी को जिस तबके के लिए फायदेमंद बताया जाता है, यह उस तबके का भला नहीं करती। यह तो बिचौलियों के लिए मलाई जैसी होती है। सब्सिडी जन कल्याण का छलावा भर है। भारत में लोगों को लगता है कि यहां जो सब्सिडी की व्यवस्था लागू है, वह गरीबों की हितैषी है, जबकि हकीकत यह है कि सरकार जितना सब्सिडी देती है, उससे ज्यादा राशि गरी

राजकोषिय घाटे को कम करने के उपाय के तहत किसी भी सरकार की निगाह सबसे पहले पेट्रोलियम पदार्थों पर दी जाने वाली भारी भरकम सब्सिडी पर ही केंद्रीत होती है। राष्ट्रीय आय को बढ़ाने में असफल सरकारें अपने घाटे को कम करने के लिए सबसे पहले सब्सिडी को ही घटाने का फैसला लेती हैं। कभी अंतराष्ट्रीय कीमतों का हवाला देकर तो कभी पेट्रोलियम कंपनियों को होने वाले नुकसान की बात कह सब्सिडी घटाने का काम किया जाता है। हालांकि थोड़ा-थोड़ा कर सब्सिडी घटाने का फायदा न तो अर्थव्यवस्था को मिल पाता है ना ही जनता को हमेशा के लिए इससे मुक्ति। और तो और कालाबाजारियों को लूट खसोट करने और पैसा बनाने का मौका

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