मुक्ति

अठारहवी सदी में अंद्रेजों के समय में जस्टिस के तौर पर काम करनेवाल महादेव गोविंद रानाडे  बहुआयामी व्यक्तित्व थे। वे ऊचे दर्जे के उदावादी चिंतक थे तो जुझारू समाज सुधारक भी। वे भारत की औद्योगिक क्रांति के स्वप्नद्रष्टा थे जिन्होंने अपने स्वप्न को साकार करने की भरपूर कोशिश की। उनकी दृढ़ मान्यता थी यदि भारत की गरीबी को दूर करना है तो उसका एक ही उपाय है तीव्रगति से औद्योगिक विकास। इसके लिए वे आर्थिक समस्याओं के अध्ययन के लिए संस्थानों की स्थापना करना चाहते थे। उन्होंने 1885 में नेशनल सोशल कान्फ्रेंस और 1890 में इंडस्ट्रियल एसोसिएशन की स्थापना की। इन संगठनों द्वारा तैयार कि