माकपा

राजनीतिक दलों को सूचना अधिकार (आरटीआइ) के दायरे में लाने के केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) के हालिया फैसले से यह पुष्टि हो गई है कि अधिकांश राजनीतिक दल धनराशि जुटाने, पार्टी टिकट देने और इस प्रकार के अन्य अंतर्दलीय मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही के खिलाफ हैं। सबसे अधिक निराशा यह देखकर हुई कि कभी खुद को अलग तरह की पार्टी बताने वाली भारतीय जनता पार्टी भी घोटालों की दागी कांग्रेस की राह पर चल रही है और आदेश की वैधानिकता पर सवाल उठाकर कांग्रेस को बचाने का प्रयास कर रही है। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ने सीआइसी के आदेश को एडवेंचरिस्ट बताया और यह अजी

प्रसेनजीत बोस मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के युवा नेता है । इसके अलावा  वे पार्टी की रिसर्च यूनिट के संयोजक हैं। पिछले दिनों सतीश पेडणेकर  ने उनसे बजट और देश की आर्थिक स्थिति पर बातचीत की । यहां उसके कुछ अंश प्रस्तुत हैं -

कभी बजट केवल बैलेंस आफ बुक ही नहीं होता था उससे देश की आर्थिक नीति की दिशा भी तय होती थी। क्या अब बजट का वह महत्व खत्म हो रहा है?

पिछले दिनों मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमेटी की अत्यंत महत्वपूर्ण  बैठक में पार्टी के विचारधारा संबंधी प्रस्ताव के मसौदे को अंतिम रूप दिया । इस प्रस्ताव को अगले वर्ष होनेवाली पार्टी कांग्रेस में पेश किया जाएगा।पार्टी कांग्रेस ही माकपा की सबसे बड़ी नीति नियंता होती है।इस प्रस्ताव को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि माकपा  बीस साल बाद एक बार फिर विचारधारा संबधी प्रस्ताव तैयार कर रही है।यह बात अलग है कि साम्यवादी आंदोलन के कई जानकार ये मानते हैं कि यह प्रस्ताव वैचारिक लीपापोती ही होगी क्योंकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों में वैचारिक साहसिकता और