माओवादी

फिर देखने को मिले वे दर्दनाक नजारे। वे तिरंगे में लिपटे हुए कच्ची लकड़ी के ताबूत, उन पर रखी गई गेंदे के फूलों की मालाएं...उन बहादुर जवानों को इस देश के लोगों की आखिरी भेंट। फिर सुनने को मिले हमारे गृह मंत्री से वही भाषण, जो हम बहुत बार सुन चुके हैं। हम नहीं बख्शेंगे उनको जिन्होंने ऐसा किया है, हत्यारों को ढूंढेंगे हम और उनको दंडित करेंगे।

दुनियाभर के माओवादियों का मानना है कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है।लेकिन शायद माओवादी नेताओं को बंदूक थमाने के लिए पर्याप्त बालिग शूरमा नहीं मिल रहे हैं इसलिए वेबच्चों को बंदूक थमाकर सत्ता पाना चाहते हैं।लेकिन दुर्भाग्य से माओवादी प्रभावित  इलाकों में  जिन बच्चों को इस उम्र में स्कूल में होना चाहिए था वे वे माओवादी क्रांतियुद्ध के सैनिक बनकर क्रांतियुद्ध लड़ रहे हैं।खेलने कूदने और ढ़ने लिखने की  उम्र में उनमें से कई खूंख्वार और दुस्साहसी बन चुके हैं।

आंध्रप्रदेश सरकार माओवादी हिंसा पर प्रभावी ढंग से काबू पाने के लिए अपनी पीठ थपथपा सकती है। वैसे सारे देश को ही उसकी पीठ थपथपानी चाहिए। पिछले तीस वर्षों के दौरान वर्ष 2011 पहला मौका है जब राज्य में माओवादी हिंसा में  भारी कमी आई है। इस साल माओवादी हिंसा के केवल 41 मामले दर्ज हुए, छह लोगों की जानें गईं और कोई भी पुलिसवाला हिंसा का शिकार नहीं बना। यह आंकंड़े बताते है  कि माओवादी हिंसा से सबसे ज्यादा त्रस्त इस राज्य ने पिछले तीन दशकों में माओवादी हिंसा से लगातार संघर्ष करने के बाद उसपर प्रभावी तरीके से नियंत्रण पाने में महत्वपूर्ण सफलता पाई है। ऐसे समय जब हाल ही में

माओ ने कहा था – सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। इसका तात्पर्य यह था कि क्रांति सशस्त्र संघर्ष के जरिये ही हो सकती है। भारत के माओवादी अच्छी तरह जानते हैं कि सशस्त्र संघर्ष के लिए अस्त्र-शस्त्र और हथियार खरीदने के लिए जेब भरी होना जरूरी है। उसीतरह बंदूक चलानेवालों का पेट भरा होना चाहिए तभी वह डटकर संघर्ष कर सकते हैं इसलिए माओवादी हर वैध और अवैध तरीके से पैसा जुटाकर अपनी तिजोरियां भरनें में लगे हैं। माओवदियों का आर्थिक साम्राज्य कितना बड़ा है इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि  कुछ अर्से पहले केंद्रीय गृहसचिव ने कहा था कि माओवादी हर साल 1600 से 2000 करोड़