माओवाद

यह महज संयोग ही है कि जिस समय म्यांमार की लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू की चालीस साल बाद भारत के दौरे पर थीं, ठीक उसी समय हमारे पड़ोस चीन में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) की 18वीं कांग्रेस की बैठक का आयोजन किया जा रहा था। दुनियाभर में इस कांग्रेस पर सबकी निगाहें थीं। खासकर भारत के लिए तो एक पड़ोसी होने के नाते यह और भी अहम था। जहां बरसों की नजरबंदी के बाद रिहा हुई सू की लोकतंत्र की पड़ताल करने के लिए इन दिनों लोकतांत्रिक देशों का दौरा कर रही हैं, वहीं चीन में इन दिनों पिछले पचास साल से चले आ रहे माओवादी ढांचे को तोड़ने की छटपटाहट साफ नजर आ रही है।

विश्व पटल पर मार्क्सवाद, माओवाद व लेनिनवाद के एकमात्र विशुद्ध (अघोषित) झंडाबरदार चीन में विगत तीन दशकों में परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। एक तरफ जहां उदारवाद ने तेजी से पांव पसारे हैं वहीं माओ व माओवाद हाशिए पर पहुंच गया है। वर्तमान चीन व चीनी जनता ज्यादा से ज्यादा धन कमाना चाहती है और वह जान चुकी है कि आर्थिक उदारीकरण ही इसके लिए सर्वश्रेष्ठ उपाय है। हालांकि इसकी नींव डैंग झायोपिंग और जियांग जिमेन के शासनकाल में ही पड़ गई थी और चीन के बुनियादी स्वरूप में बदलाव का आधार तय हो गया था। इसके साथ यह भी स्पष्ट हो गया था कि माओ जिस चीनी लोक गणराज्य को स्थापित किया था उ

छत्तीसगढ़  में 7 अक्टूबर को लैंडमाइन धमाके में माओवादी विद्रोहियों ने चार जवानों को मौत के घाट उतार दिया। फिर भी इस खबर ने लोगों का ध्यान नहीं खींचा। अखबारों में छोटी सी खबर छपी और अगले दिन गायब हो गई। इस खबर के साथ इतना तिरस्कारपूर्ण व्यवहार नहीं होता, अगर यह किसी जिहादी द्वारा किया गया आतंकी धमाका होता। भारतीय माओवाद को गंभीरता से नहीं लेते। इसको लेकर वे विभ्रम का शिकार है। माओवादी समस्या पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं होती है।

Author: 
गुरचरण दास