मनमोहन सिंह

कुछ दिनों पहले रविवार की रात एक टीवी शो में एंकर ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 5 लाख करोड़ डॉलर के जीडीपी के लक्ष्य का तिरस्कारपूर्व बार-बार उल्लेख किया। यह शो हमारे शहरों के दयनीय पर्यावरण पर था और एंकर का आशय आर्थिक प्रगति को बुरा बताने का नहीं था, लेकिन ऐसा ही सुनाई दे रहा था। जब इस ओर एंकर का ध्यान आकर्षित किया गया तो बचाव में उन्होंने कहा कि भारत की आर्थिक वृद्धि तो होनी चाहिए पर पर्यावरण की जिम्मेदारी के साथ। इससे कोई असहमत नहीं हो सकता पर दर्शकों में आर्थिक वृद्धि के फायदों को लेकर अनिश्चतता पैदा हो गई होगी।

Author: 
गुरचरण दास

महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों का केवल व्यक्तिगत तौर पर ईमानदार होना पर्याप्त नहीं, यह एक बार फिर साबित हो रहा है रक्षामंत्री एके एंटनी की नाकामी से। वह चौतरफा नाकामियों से घिरे हैं। खराब बात यह है कि वह न तो रक्षा सामग्री की खरीद में घपले-घोटाले रोक पा रहे हैं और न ही सेनाओं के आधुनिकीकरण को गति दे पा रहे हैं। इससे भी खराब बात यह है कि उनके कार्यकाल में भारतीय सेनाएं दिन-प्रतिदिन दुर्बलता की ओर बढ़ती दिख रही हैं। न तो थल सेना की जरूरतें पूरी हो पा रही हैं, न वायु सेना की और न ही नौसेना की। जब उन पर सवाल उठते हैं तो उनके समर्थक-शुभचिंतक उनकी ईमानदारी का उल्लेख क

इतिहास के सबसे बड़े सबकों में से एक यह है कि केवल औद्योगिक क्रांति ही किसी गरीब राष्ट्र को समृद्ध बना सकती है। हर सफल राष्ट्र मैन्यूफैक्चरिंग से ही समृद्ध हुआ है। केवल इसी तरह कोई राष्ट्र लाखों अकुशल युवाओं को काम दे सकता है, लेकिन दो दशकों के सुधारों के बाद भी भारत अब तक औद्योगिक क्रांति नहीं ला पाया है। इसकी अर्थव्यवस्था अब भी उत्पादन क्षेत्र की बजाय सेवा क्षेत्र पर आधारित है। त्रासदी यह है कि 90 फीसदी भारतीय अच्छी मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों में काम करने की बजाय अनियमित किस्म की अर्थव्यवस्था से जुड़े हैं। हालत यह है कि गणेशजी की प्र

हाल ही में वित्तमंत्री पी. चिदंबरम थकाऊ विदेश दौरे से वापस लौटे हैं, जहां उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की सुनहरी तस्वीर पेश करते हुए मौजूदा और संभावित निवेशकों को भारत के प्रति लुभाते हुए कहा कि भारत व्यापार के लिए आकर्षक गंतव्य है। उन्होंने रेटिंग एजेंसियों को भी लुभाने का प्रयास किया कि कहीं वे भारत की रेटिंग न गिरा दें। वह अपने मकसद में कितने कामयाब हुए यह तो आने वाले महीनों में ही पता चलेगा जब उनके मंत्रालय को अगले आम चुनाव की तैयारियों के तहत लोकप्रिय राजनीति का बोझ उठाना पड़ेगा।

आर्थिक सुधारों के मद्देनजर एफडीआइ के फैसले ने विपक्ष को भले आक्रामक किया हो, लेकिन सरकार ने भी यह तय कर लिया है कि नहीं झुकेगी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी साफ कह दिया है कि देश को वे 1991 की स्थिति में नहीं ले जाना चाहते। उनके इस बयान से सरकार का आत्मविश्वास भी झलक रहा है। तमाम विरोधों के बीच सरकार के बढ़ते कदम यह बताने के लिए काफी हैं कि उसके ऊपर इन विरोधों का कोई असर नहीं होने वाला। आर्थिक सुधार लागू करने के लिए सरकार तटस्थ है और वह करके रहेगी। जानकारों की मानें तो सरकार अभी और कई नए फैसले लेने वाली है, जो देश को हतप्रभ कर सकता है। रिटेल में एफडीआइ को मंजूरी दिए जान

प्रणब मुखर्जी ने वित्त मंत्रालय का कामकाज छोड़ दिया है और इसके साथ ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर यह जिम्मेदारी आ गई है कि वह अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकें। स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स की खराब रेटिंग के बाद एक और रेटिंग एजेंसी फिच द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था और सरकार के कामकाम को लेकर जब नकारात्मक रेटिंग दी गई तो इसे लेकर काफी हो-हल्ला मचा और केंद्र सरकार ने यह कहकर बचाव किया कि यह तात्कालिक नजरिये का परिणाम है। भारतीय अर्थव्यवस्था का आधारभूत ढांचा काफी मजबूत है और भारत उच्च विकास दर की पटरी पर वापस लौट आएगा, जैसा कि वर्ष 2008 की मंदी के बाद हुआ था। कहने का आशय यही था ये रेटिंग

यह सोचकर कितना अजीब लगता है कि देश में कुछ वर्ष पूर्व (लगभग एक दशक) पहले तक यदि किसी को टेलीफोन कनेक्शन लेना होता था तो उसे कितने पापड़ बेलने पड़ते थे। टेलीफोन के लिए आवेदन फार्म हासिल करने से लेकर भरे आवेदन पत्र भरकर जमा कराने, अपने नंबर का इंतजार करने, घर में फोन लग जाने में दो से तीन साल तक लग जाया करते थे। इतना ही नहीं दो-तीन साल बाद भी नंबर तब आता था जब फार्म देने वाले बाबू से लेकर अधिकारी तक की मुट्ठी गर्म नहीं की जाती थी। इसके बाद भी जबतक कुछ बड़े प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर रसूखदार लोगों के पत्र आप की सिफारिश करते विभाग तक न पहुंचे थे, तबतक घर में फोन की घंटी बजन