मनमानी

प्राइवेट स्कूलों द्वारा फीस में की जा रही मनमानी वृद्धि को लेकर पैरंट्स मे खासा आक्रोश है। हर नए साल में 30-40 प्रतिशत फीस बढ़ाना सामान्य बात हो गई है। पैरंट्स की मांग है कि सरकार स्कूल मालिकों की इस मनमानी पर अंकुश लगाए। उनकी मांग सही है। शिक्षा को पूरी तरह बाजार पर नहीं छोड़ा जा सकता। लेकिन, सरकारी दखल की अलग समस्याएं है। पूरे देश में सरकारी स्कूलों की बदहाली बताती है कि सरकारी दखल से प्राइवेट स्कूलों का भी यही हाल हो जाएगा।

आखिरकार केंद्र सरकार कोयला खदानों के आवंटन के मामले में यह मानने के लिए विवश हुई कि उससे किसी न किसी स्तर पर गलती हुई, लेकिन किसी मामले में केवल सच को स्वीकार करना पर्याप्त नहीं। सच्चाई स्वीकार करने से समस्या का समाधान नहीं होता। कोयला खदानों के आवंटन में गलती के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए, क्योंकि कोयला खदानों का आवंटन कुछ ज्यादा ही मनमाने तरीके से किया गया और इसी के चलते इस प्रक्रिया ने एक घोटाले का रूप ले लिया।

देश का राष्ट्रीय वायुवाहक एयर इंडिया संकट में है। पिछले चार वषों में सरकार ने कंपनी को 16,000 करोड़ रुपये की रकम उपलब्ध कराई है। यह रकम 500 रुपये प्रति परिवार बैठती है। इसका मतलब यह हुआ कि देश के हर परिवार से यह रकम वसूल कर एयर इंडिया को उपलब्ध कराई गई है। इतनी बड़ी राशि झोंकने के बाद भी कंपनी का घाटा थम नहीं रहा है।

खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को लेकर इन दिनों देश में बहस का दौर जारी है। इससे ग्राहकों, स्थानीय खुदरा कारोबारियों और खुदरा कारोबार के वैश्विक दिग्गजों के हित जुड़े हों तो बहस होना स्वाभाविक ही है। पिछले कई साल से इस पर बातचीत जारी है लेकिन इस दौरान कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया है। फिलहाल औद्योगिक नीति एवं संवद्र्घन विभाग (डीआईपीपी) ने एफडीआई से जुड़े जिन व्यापक मुद्दों पर चर्चा पत्र पेश किया है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। इसके जरिये विभाग ने सभी अंशधारकों का पक्ष जानने की कोशिश की है।

भारत के बारे में विदेशियों के बीच एक बात पर अवश्य राय कायम होते देखा जा सकता है। और यह राय यहां कानूनों की अधिकता और उसके न्यूनतम अनुपालन को लेकर है। यह नकारात्मक राय इन दिनों एक और कानून की अनदेखी के कारण और प्रबल हो रहा है। इस बार ऐसा आरटीई यानी शिक्षा का अधिकार कानून के अनुपालन में हो रही लापरवाही और हीला हवाली के कारण हो रहा है। दरअसल,निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए वर्ष 2009 में निर्मित शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) को हर हाल में कड़ाई से लागू किए जाने को लेकर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद ऐसा लगा कि देश में शिक्षा क्रांति का प्रादुर्भा