भारत

हाल ही में मदर टेरेसा के निधन ने सारे विश्व का ध्यान कलकत्ता और आमतौर पर भारत की  दारुण गरीबी की ओर आकर्षित किया। मदर टेरेसा ने  बेहद गरीब देश के सबसे गरीब  लोगों की सेवा की । जिस देश में संन्यास,भौतिकवाद का विरोध और भाग्यवाद वहां के बहुसख्यकों के धर्म हिन्दू का अपरिहार्य अंग हैं।जो लोग इन सिद्धांतो का अनुकरण करते है  उनके लिए गरीबो की आर्थिक स्थिति को बदलने की कोशिश फिजूल है। उनके लिए गरीबी नहीं वरन समृद्धि अचरज का विषय है।

नई दिल्ली, भारत – सेंटर फार सिविल सोसायटी द्वारा आज यहां जारी  विश्व आर्थिक स्वतंत्रता : वार्षिक रपट 2012 में भारत 144 देशों में 111 वे स्थान पर रहा है। भारत पिछले वर्ष भी 103 वे स्थान पर था। भारत की कुल रेटिंग 6.26 रही इस तरह से वह चीन,बांग्लादेश,तंजानिया और नेपाल से पीछे रहा।

दुनियाभर में विश्व आर्थिक स्वतंत्रता सूचकांक में थोड़ी सी वृद्धि हुई और वह  2010 में 6.83 रही।2009 में वह तीन दशक में सबसे कम स्तर पर यानी 6.79 पर पहुंच गया था।

वर्ष 1991 के बाद आर्थिक सुधारों पर किसी भी चर्चा में एक बात अक्सर कही जाती है –अमीर अमीर हो रहे हैं और गरीब और गरीब । 1991 वह साल था जिसके बाद देश में अंदरूनी आर्थिक सुधारों के जरिये उदारीकरण की शुरूआत हुई तो दूसरी तरफ देश के बाजारों को बाहरी प्रतियोगिता के लिए खोला गया। बहुत से लोग यह महसूस करते हैं कि इस उदारीकरण और वैश्वीकरण का लाभ गरीबों को नहीं मिला।

इस वर्ष मानसून बहुत कमजोर रहा जैसा 1965 में रहा था। लेकिन इस बार इसे थोड़ी बड़ी असुविधा से ज्यादा महत्व नहीं दिया जा रहा जबकि 1965 में यह दैत्याकार और भयावह आपदा थी। भारत पर अब सूखे का असर न पड़ना एक यशोगाथा है लेकिन  ऐसी जिसे आमतौर पर गलत समझा गया है।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

बड़े उद्योगपति नहीं छोटे और मंझोले व्यवसायी होंगे विकास के वाहक

न संसाधनों का अभाव न क्षमता का, अभाव है सही आर्थिक नीति का

इंटरनेशनल फूड पालिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैशिवक भूख सूचकांक के मुताबिक भारत 87 देशों की सूची में 67 वे स्थान पर है और 20 करोड़ अन्न के अभाव का शिकार हैं। यह बात पक्के तौर पर कही जा सकती है कि  सरकार के नीतिगत हस्तक्षेप इस भूख और भुखमरी का प्रमुख कारण है। मेरा यह कहना है कि  सरकार के नीतिगत हस्तक्षेप से जो विकृतियां या असंतुलन पैदा होते हैं वे समूह को प्रभावित करते हैं। उसके लिए जरूरी होता है कि नए हस्तक्षेप किए जाएं जो पहले हस्तक्षेप के कारण हुए नुक्सान को दूर कर सकें। इससे अंतहीन सरकारी हस्तक्षेपों का सिलसिला शुरू होता है जो आर्थिक विकास की उपेक्षा क

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उदारवादी अर्थशास्त्री क्रिस्टोफर लिंगल पिछले दिनों भारत यात्रा पर आए हुए थे।उन्होंने सेंटर फार सिविल सोसायटी के चिंतन श्रृंखला के अतर्गत दो भाषण दिए। वे ग्वाटेमाला के विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर है इसके अलावा सेंटर फार सिविल सोसायटी में रिसर्च स्कालर हैं।राजनीतिक अर्थशास्त्र और अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र उनकी दिलचस्पी के मुख्य विषय रहे हैं।जिन्हें वे उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं पर फोकस करते हैं। उनकी सिंगापुर के राजनीतिक अर्थशास्त्र पर लिखी  Singapore's Authoritarian Capitalism: Asian Values, Free Market Illusions, and Political Dependency और  The Rise an

भारतीय जनगणना रपट 2011 के नवीनतम  आंकड़े जारी होने के बाद मुझसे पूछा गया कि क्यों भारत में इतने सारे मोबाइल है लेकिन पर्याप्त शौचालय नहीं हैं।हालांकि पचास प्रतिशत से ज्यादा लोगों  के पास मोबाइल हैं लेकिन इतने लोगों के यहां शौचालय नहीं हैं। मेरे देश की असाधारण कहानी  में ऐसे विरोधाभास ढ़ेर सारे हैं। विकास रिसकर नीचे की तरफ पहुंच रहा है। लेकिन सरकार ने जिन सेवाओं को मुहैया कराने का वायदा किया है वे तो अब भी नदारद हैं।

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