भारतीय रेल

1995 में सीके जाफर शरीफ के बाद पवन कुमार बंसल रेल बजट पेश करने वाले पहले कांग्रेसी रेल मंत्री हैं। इसलिए लोग उम्मीद कर रहे थे कि इस बार 'रीजनल' नहीं 'नैशनल' रेल बजट आएगा। लेकिन कुछेक अपवादों को छोड़कर रेल बजट लकीर का फकीर ही साबित हुआ। 1990 के दशक में शुरू हुई गठबंधन राजनीति के नफा-नुकसान पर बहस हो सकती है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इसने भारतीय रेल का कबाड़ा कर दिया। इस दौरान रेल मंत्रालय को सहयोगी दलों को दहेज में दिया जाने वाला 'लग्जरी आइटम' मान लिया गया। सहयोगी दलों से बनने वाले रेल मंत्रियों ने इसका जमकर फायदा उठाया और उनमें रेलवे से जुड़ी परियोजनाओं को अपने-अपने गृह

भारत और चीन के बीच तुलना करने का चलन एक अर्से से पूरी दुनिया में चल रहा है। कई मामलों में भारत को चीन से शिक्षा लेने को कहा जाता है, कुछ में चीन को भी भारत से सीखने की सलाह दी जाती है। लेकिन हाल में लिए गए चीन सरकार के सबसे बड़े प्रशासनिक फैसले से कुछ सीखने की हिम्मत क्या भारत सरकार कभी जुटा पाएगी?

राजधानी व शताब्दी सहित कुछ इक्का दुक्का रेलगाड़ियों को छोड़ दें तो भारतीय रेल में यात्रा करने का मेरा अनुभव कुछ ज्यादा अच्छा नहीं रहा है। दूर दराज के छोटे शहरों तक पहुंचने का कोई अन्य विकल्प न होने के कारण भारतीय रेल सेवा का प्रयोग करना मजबूरी ही होती है। ट्रेन में बर्थ की अनुपलब्धता, टिकट के लिए मारामारी के बाद रही सही कसर यात्रा के दौरान पेंट्रीकार का खाना और गंदे बेडिंग से पूरी हो जाती है। और तो और सामान्य रेलगाड़ियों के अप्रशिक्षित कोच अटेंडेंट, उनकी बेतरतीब गंदी वर्दी और टायलेट की स्थिति यात्रा को ‘सफर’ बनाने के लिए काफी होती है। हर बार सरकार व रेल मंत्रालय

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