बीमार

मार्क्स के दिमाग में एक बुनियादी रोग था। और वह रोग यह था कि वह चीजों को संघर्ष की भाषा में ही सोच सकता था, सहयोग की भाषा में सोच नहीं सकता था। द्वंद की भाषा (डायलेक्टीक्स) की भाषा में सोच सकता था। वह सारे विकास को कंफ्लिंक्ट की भाषा में सोच सकता था कि सारा विकास द्वंद है। यह पूरी तरह सच नहीं है। निश्चित विकास में द्वंदता एक तत्व है। लेकिन द्वंद विकास का आधार नहीं है, द्वंद से भी गहरा सहयोग विकास का आधार है। असल में द्वंद की वहीं जरूरत पड़ती है, जहां सहयोग असंभव हो जाता है। द्वंद मजबूरी है, सहयोग स्वभाव है। और द्वंद भी अगर हमें करना पड़े तो उसके लिए भी हमें सहयोग करना पड़त