प्रायवेट

अब ट्रेन आनंद विहार से मुगलसराय के लिए चल पड़ी। थोड़ी ही देर में वर्दीधारी अटेडेंट चेहरे पर मुस्कान और हाथ में बेडिंग लिए हमारे समक्ष फिर अवतरित हुआ। ‘योर बेडिंग्स सर’ के साथ उसने साफ सुथरे बेडशीट, पिलो और टावेल हम सभी की सीटों पर रख दिए। जबकि आमतौर पर ट्रेन यात्रा में कोच अटेंडेंट्स से टॉवेल लेने के लिए खासी बहस करने की जरूरत पड़ती है। भारतीय रेलवे की कार्यप्रणाली में यह सुखद परिवर्तन मेरे अंदर के पत्रकार को इन सबके बारे में जानने के लिए उत्सुक करने लगा। सहयात्रियों के साथ बातचीत के बाद यूं ही हाथ-पैर सीधा करने के उद्देश्य से मैं गेट तक और फिल ‘लघुशंका’ महसूस न

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