प्रतिस्पर्धा

मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश की इजाजत के बाद बवंडर सा मचा हुआ है। इंश्योरेंस सेक्टर में विदेशी निवेश की सीमा 26 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत होने पर अलग बवाल है। दो एकदम विपरीत ध्रुवों की राय सामने आ रही है। सरकारी पक्ष कह रहा है कि विदेशी निवेश आने से रोजगार बढ़ जायेगा, उपभोक्ताओं का भला होगा। कोल्ड स्टोरेज बनेंगे। फल अन्न की बरबादी रुकेगी। सरकार विरोधी पक्ष का कहना है कि भारत तबाह हो जायेगा, रोजगार खत्म हो जायेंगे। उपभोक्ता लुट जायेंगे। दोनों ही अतिवादी दृष्टिकोण हैं, रास्ता कहीं बीच से होकर जाता है।

Author: 
आलोक पुराणिक

कोयला घोटाले से पस्त सरकार, पिछले एक पखवाड़े के भीतर लंबे समय से अपेक्षित कुछ सुधारों पर आगे बढ़ी है। इनमें मल्टी ब्रांड रिटेल और विमानन क्षेत्र में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की अनुमति शामिल है। एफडीआई के मुद्दे पर देश में तेज प्रतिक्रिया हुई और “वाद विवाद के लिए तैयार भारतीयों” के बीच यह हमेशा बनी रह सकती है।

वह जादूगर क्या खूब करामाती था। उसने सवाल उछाला। कोई है जो बीता वक्त लौटा सके?..मजमे में सन्नाटा खिंच गया। जादूगर ने मेज से संप्रग सरकार के पिछले बजट उठाए और पढ़ना शुरू किया। भारी खर्च वाली स्कीमें, अभूतपूर्व घाटे! भीमकाय सब्सिडी बिल! किस्म किस्म के लाइसेंस परमिट राज!

अक्सर यह बात सुनने में आती है कि भारतीय छात्र वैश्विक स्तर पर अपनी मेहनत व विषय विशेषज्ञता का लोहा मनवा रहे हैं। अक्सर अंतराष्ट्रीय स्तर के शोध व अध्ययनों में भारतीय व चीनी बच्चों के दुनियां के अन्य बच्चों से अधिक सक्षम बताया जाता है। गाहे-बगाहे दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश माने जाने वाले राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति भी अपने बच्चों को भारतीय व चीनी छात्रों से सबक लेने और समान रूप से प्रतिस्पर्धी बनने की अपील करते रहते हैं। ऐसे रिपोर्टों का हवाला देते हुए हमारी सरकारें भी अपना पीठ थपथपाती दिखती हैं। लेकिन व्यवहारिक स्तर पर क्या हमें अपने आसपास ऐसा देखने को मिलता है। आखिर

इस सवाल का जो लगभग अनबूझ जवाब मैंने दिया है उसका महत्व समझने में कुछ पल का वक्त लगेगा, मैं यह कह रहा हूं कि स्कूलों के बीच प्रतिस्पर्धा संबंधित स्कूलों, परिवारों और कुल मिलाकर समाज के लिए या तो अच्छी हो सकती है या फिर बुरी। यह सब परिस्थितियों पर निर्भर है, जिसमें कानून

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