पूजा स्पेशल ट्रेन

अब ट्रेन आनंद विहार से मुगलसराय के लिए चल पड़ी। थोड़ी ही देर में वर्दीधारी अटेडेंट चेहरे पर मुस्कान और हाथ में बेडिंग लिए हमारे समक्ष फिर अवतरित हुआ। ‘योर बेडिंग्स सर’ के साथ उसने साफ सुथरे बेडशीट, पिलो और टावेल हम सभी की सीटों पर रख दिए। जबकि आमतौर पर ट्रेन यात्रा में कोच अटेंडेंट्स से टॉवेल लेने के लिए खासी बहस करने की जरूरत पड़ती है। भारतीय रेलवे की कार्यप्रणाली में यह सुखद परिवर्तन मेरे अंदर के पत्रकार को इन सबके बारे में जानने के लिए उत्सुक करने लगा। सहयात्रियों के साथ बातचीत के बाद यूं ही हाथ-पैर सीधा करने के उद्देश्य से मैं गेट तक और फिल ‘लघुशंका’ महसूस न

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राजधानी व शताब्दी सहित कुछ इक्का दुक्का रेलगाड़ियों को छोड़ दें तो भारतीय रेल में यात्रा करने का मेरा अनुभव कुछ ज्यादा अच्छा नहीं रहा है। दूर दराज के छोटे शहरों तक पहुंचने का कोई अन्य विकल्प न होने के कारण भारतीय रेल सेवा का प्रयोग करना मजबूरी ही होती है। ट्रेन में बर्थ की अनुपलब्धता, टिकट के लिए मारामारी के बाद रही सही कसर यात्रा के दौरान पेंट्रीकार का खाना और गंदे बेडिंग से पूरी हो जाती है। और तो और सामान्य रेलगाड़ियों के अप्रशिक्षित कोच अटेंडेंट, उनकी बेतरतीब गंदी वर्दी और टायलेट की स्थिति यात्रा को ‘सफर’ बनाने के लिए काफी होती है। हर बार सरकार व रेल मंत्रालय

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