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केंद्रीय सरकार ने राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखने के लिए इस कानून में जरूरी बदलाव लाने का निर्णय अगस्त 1 को ले लिया। इससे पहले विभिन्न प्रमुख राजनीतिक दलों पर इस विषय पर आम सहमति बनती नजर आई थी कि उन्हें सूचना के अधिकार की जिम्मेदारी से मुक्त रखा जाए। इससे राजनीतिक दलों की पोल अच्छी तरह खुल गई है और देश के नागरिकों को पता चल गया है कि चाहे सत्ताधारी दल हो या विपक्षी दल, वे सभी अपने को पारदर्शिता से बचाना चाहते हैं। इससे पहले केंद्रीय सूचना आयोग ने इस बारे में तर्कसंगत फैसला दिया था कि सूचना के अधिकार के कानून के अंतर्गत सार्वजनिक प्राधिकर

भ्रष्टाचार और घोटालों के माध्यम से लाखों करोड़ों रुपए का वारा न्यारा कर चुकी सरकारों का यह बयान कि "घोटालों से देश को जीरो लॉस हुआ है" यह बताने के लिए काफी है कि करदाता के खून पसीने से अर्जित धन का इनके लिए क्या महत्व है।

 

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