पहाड़

लेह-लद्दाख घूमने गए अतुल कुमार नामक दिल्ली निवासी एक युवक को वहां के एक वर्ग विशेष की बहुलता वाले क्षेत्र में शिक्षा की दयनीय स्थति को देख काफी पीड़ा हुई। स्थानीय लोगों विशेषकर युवाओं से बातचीत में उसे पता लगा कि उन्हें पढ़ने का काफी शौक है लेकिन उन्हें पढ़ाने वाला कोई नहीं है। उन्होंनें बताया कि उनके गांव के सरकारी स्कूल में जो टीचर आते हैं वो महीनें में एक दो दिन ही क्लास लेते हैं और अधिकांश समय छुट्टी पर ही रहते हैं।

उत्तराखंड में जो भयानक नुकसान हमने पिछले सप्ताह देखा, उसके पीछे छिपे हैं कई सवाल, जिन्हें हम सिर्फ आपदा आने के समय ही पूछते हैं। बला टल जाती है, तो हम भी उन सवालों को पूछना बंद कर देते हैं। इसलिए हम आज तक समझ नहीं पाए हैं विकास और पर्यावरण का नाजुक रिश्ता और न ही हमारे शासकों ने समझने की कोशिश की है कि विकसित देशों में विकास के बावजूद पहाड़ क्यों सुरक्षित हैं, नदियां क्यों साफ हैं।