पर्यावरण

देवलोक में शायद कोई होगा भारत के भाग्य का विधाता कि जिस सप्ताह महाकुंभ शुरू हुआ उसी सप्ताह पर्यावरण मंत्रालय का एक भ्रष्ट अधिकारी पकड़ा गया। इसलिए कहती हूं ऐसा, क्योंकि अगर आपको उदाहरण चाहिए पर्यावरण मंत्रालय की लापरवाही और नालायकी का तो वह मिलता है गंगा और यमुना नदियों के मैले पानी में। भ्रष्ट न होते पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारी तो इन पवित्र नदियों का पानी आज मैला बिल्कुल न होता बावजूद इसके कि इन नदियों की सफाई पर हजारों करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं पिछले पच्चीस वर्षों में। पहला गंगा एक्श्न प्लान (गंगा सफाई योजना) की शुरुआत हुई थी जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे।

पूंजीवाद, बाजारवाद और पूर्ण प्रतियोगिता की अवधारणा ही एक ऐसा सिद्धांत है जिसे अपनाकर कोई भी देश एक साथ सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक समस्याओं सहित सभी समस्याओं से न केवल निजात पा सकता है बल्कि तरक्की और विकास के मार्ग पर भी अग्रसर हो सकता है। देश की तंगहाल आर्थिक स्थिति से निराश जनता और बाजार ने नब्बे की दशक में ऐसे अप्रत्याशित विकास को प्राप्त कर इसकी अनुभूति भी कर चुकी है। लेकिन वर्तमान समय में इरादतन अथवा गैर इरादतन ढंग से बाजार से प्रतियोगिता की स्थिति बनाने की बजाए इसे और हतोत्साहित किया जा रहा है जिसका परिणाम महंगाई, मुद्रा स्फिति आदि जैसी समस्याओं के रूप में हमारे साम

Category: 

Pages