पर्यावरण मंत्रालय

बीते 16-17 जून की रात उत्तराखंड में हुए जलप्लावन और जनधन की अपार क्षति के बाद एक बार फिर से पहाड़ों पर निर्माण और विकास कार्यों की सार्थकता और आवश्यकता पर पर्यावरणविदों व भूगर्भविज्ञानियों के बीच बहस तेज हो गई है। अचानक से ही पहाड़ों को तोड़ने के लिए विस्फोटकों के हुए प्रयोग की मात्रा का हिसाब किताब ढूंढ ढूंढकर निकाला जाया जाने लगा है। टिहरी बांध के साथ ही साथ होटलों, रिजॉर्टो के निर्माण कार्यों की एक सुर में आलोचना की जाने लगी है। कारपोरेट्स, उद्योग जगत व बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित लोगों द्वारा उन्हें विनाश का पुरोधा बताया जाना तो अवश

उत्तराखंड में जो भयानक नुकसान हमने पिछले सप्ताह देखा, उसके पीछे छिपे हैं कई सवाल, जिन्हें हम सिर्फ आपदा आने के समय ही पूछते हैं। बला टल जाती है, तो हम भी उन सवालों को पूछना बंद कर देते हैं। इसलिए हम आज तक समझ नहीं पाए हैं विकास और पर्यावरण का नाजुक रिश्ता और न ही हमारे शासकों ने समझने की कोशिश की है कि विकसित देशों में विकास के बावजूद पहाड़ क्यों सुरक्षित हैं, नदियां क्यों साफ हैं।