न्याय में देरी

भारत में न्याय कछुआ चाल से होता है। मुकदमों के निपटारे की बेहद धीमी रफ्तार का ही नतीजा है कि  देश के न्यायालयों में 2 करोड़ 60 लाख से ज़्यादा मुक़दमे लंबित हैं। इनमें से कई तो आधी सदी से भी ज़्यादा पुराने हैं। आज की तारीख में सुप्रीम कोर्ट र्में कुल 56,304 मुकदमे लंबित हैं। इस न्यायालय में एक साल तक पुराने मुकदमों की कुल संख्या 19,968 हैं। यही हाल हाईकोर्टों का भी है। यहां पांच लाख 30 हजार याचिकाएं तो वह हैं जो 10 से ज्यादा वर्षों से लंबित हैं। निचली अदालतों में तो अराजकता फैली हुई है। वहां तो लंबित मामलों की संख्या करोड़ों में है।

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लोकपाल बिल कुछ और समय के लिए टल गया है और अन्ना हजारे की टीम ने एक और आंदोलन करने की बात कही है। लोकायुक्त के मसले और लोकपाल को कौन हटा सकता है, लोकपाल से सीबीआई का रिपोर्टिंग संबंध कैसा होगा, जैसे बिंदुओं पर अब भी राजनीतिक दलों में सामंजस्य नहीं है। लेकिन वास्तव में ये सभी बहसें अर्थहीन हैं। वास्तविक समस्या है न्याय प्रक्रिया में होने वाला विलंब। यदि सीबीआई पर लोकपाल का नियंत्रण हो, तब भी अदालतों पर तो उसका कोई नियंत्रण नहीं होगा। निचली अदालतों में अनेक कारणों और अनेक तरीकों से अदालती मामलों को लंबित किया जाता है। यह एक बड़ी समस्या है। जैसा कि एक पुरानी कहावत भी है : देर

Author: 
गुरचरण दास