नैतिक

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कश्मीर में ताजा संकट ने उन प्रेतों को फिर जगा दिया है जिन्हें हमने सोया मन लिया था ! मेरे भीतर एक उदार आवाज उठती है, जो कहती है कि लोगों को यह चुनने का हक है कि जैसा जीवन वह जीना चाहते है और किस मुल्क में रहना चाहते है ! इसलिए घाटी के चालीस लाख लोगों को उनके  इच्छा के विरुध्द भारत में रहने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए ! उदारवादी इसे आत्म- निर्णय का अधिकार कहते है ! इसी सिध्दांत के बल पर हमने ब्रिटेन से आजाद होने की लड़ाई लड़ी थी और यही अब हमें कश्मीर पर लागू करना चाहिए ! दूसरी ओर, उस देश कि पुकार भी मेरे भीतर उठती है जिसने पिछले साठ सालों से मुझे पाला-पोसा है !

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