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देश-विदेश में तमाम आलोचना के बाद संप्रग सरकार ने आखिरकार अपनी दूसरी पारी में बड़े आर्थिक सुधारों की शुरुआत करने का साहस दिखाया। मनमोहन सिंह सरकार की ओर से यह साहस तब दिखाया गया जब देश में आर्थिक प्रगति की रफ्तार लगातार घटती जा रही है और इसके चलते विश्व में भारत की साख भी प्रभावित हो रही है। पिछले दिनों योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने जब सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में वृद्धि दर महज पांच फीसदी ही रहने की संभावना व्यक्त की थी तभी यह महसूस किया जाने लगा था कि बड़े आर्थिक सुधारों में देरी बहुत भारी पड़ने जा रही है। सरकार के पास इसके अलावा अन्य कोई

प्रणब मुखर्जी ने वित्त मंत्रालय का कामकाज छोड़ दिया है और इसके साथ ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर यह जिम्मेदारी आ गई है कि वह अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकें। स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स की खराब रेटिंग के बाद एक और रेटिंग एजेंसी फिच द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था और सरकार के कामकाम को लेकर जब नकारात्मक रेटिंग दी गई तो इसे लेकर काफी हो-हल्ला मचा और केंद्र सरकार ने यह कहकर बचाव किया कि यह तात्कालिक नजरिये का परिणाम है। भारतीय अर्थव्यवस्था का आधारभूत ढांचा काफी मजबूत है और भारत उच्च विकास दर की पटरी पर वापस लौट आएगा, जैसा कि वर्ष 2008 की मंदी के बाद हुआ था। कहने का आशय यही था ये रेटिंग