धंधा

 

कांग्रेस कार्यकर्ताओं के कहर का शिकार हुआ एक रेस्तरां। आम से खास तक केंद्र सरकार में हो रहे रोज-रोज घोटाले और तमाम टैक्स से त्रस्त है। सभी लोग अलग अलग तरीके से अपना गुस्सा व्यक्त कर रहे हैं। लेकिन मुंबई में एक रेस्तरां के मालिक ने अपने रेस्तरां के बिल को ही गुस्सा व्यक्त करने का जरिया बना डाला। फिर क्या था, कांग्रेसी कार्यकर्ता उग्र हुए और रेस्तरां बंद करा दिया। बंद होते ही रेस्तरां मालिक की अक्ल खुली और विरोध के इस साधन को कहा-बाय, बाय।

बारिश आई नहीं कि हमारे शहरों के बखिए उधडऩे लगते हैं। ताशमहल की तरह ढहते पुराने या निर्माणाधीन (अक्सर अवैध) नए मकान, बदहाल सड़कें, जलभराव से अदृश्य बने फुटपाथ, वाहन चालकों के दु:स्वप्न बने सड़कों पर बिछे जर्जर जड़ों वाले उखड़े पेड़, ट्रैफिक जाम और बिना ढक्कन वाले मेनहोलों से भलभलाकर सड़क पर उफनाते शहरी नाले; यह आज मानसूनी महीनों के दौरान देश के तकरीबन हर बड़े शहर का नजारा है। फिर गर्मी आई तो बिजली, पानी की कमी और बीमारियों का प्रकोप चालू हुआ। जब-जब इस बदहाली के दोष का विभिन्न राजनेताओं के बीच बंटवारा होने लगता है, तब-तब कहा जाने लगता है कि हमारा दोष नहीं, अमुक ने