दैनिक जागरण

यह अच्छा हुआ कि प्रधानमंत्री ने लखनऊ में उद्योगपतियों के बीच यह कहा कि वह उनके साथ खड़े होने में डरते नहीं। इसी के साथ उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि देश के विकास में उद्योगपतियों की भी भूमिका है। वैसे तो इस सामान्य सी बात को हर कोई समझता है, लेकिन कुछ लोग इस बुनियादी बात को समझने से इन्कार करने के साथ ही आम जनता को बरगलाने का काम भी कर रहे हैं।

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प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के माध्यम से देशभर में युवा सशक्तिकरण का अभियान पूरी लगन से जारी है। न सिर्फ केंद्र बल्कि राज्य सरकारें भी इस दिशा में प्रयासरत हैं। ऐसे में प्रशिक्षुओं को बेहतर विकल्प और संस्थानों के चुनाव की स्वतंत्रता देने की मांग भी उठ रही है। इसी आवश्यकता को देखते हुए सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) ने एक टूलकिट तैयार किया है जिससे प्रशिक्षुओं को इंस्टिट्यूट चुनने की स्वतंत्रता मिलेगी और प्रशिक्षण संस्थानों पर भी बेहतर प्रदर्शन का दबाव रहेगा।

हाल ही में वित्तमंत्री पी. चिदंबरम थकाऊ विदेश दौरे से वापस लौटे हैं, जहां उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की सुनहरी तस्वीर पेश करते हुए मौजूदा और संभावित निवेशकों को भारत के प्रति लुभाते हुए कहा कि भारत व्यापार के लिए आकर्षक गंतव्य है। उन्होंने रेटिंग एजेंसियों को भी लुभाने का प्रयास किया कि कहीं वे भारत की रेटिंग न गिरा दें। वह अपने मकसद में कितने कामयाब हुए यह तो आने वाले महीनों में ही पता चलेगा जब उनके मंत्रालय को अगले आम चुनाव की तैयारियों के तहत लोकप्रिय राजनीति का बोझ उठाना पड़ेगा।

वित्तीय घाटे का विचित्र इलाज सार्वजनिक इकाइयों के शेयर बेचकर सरकार अपना वित्तीय घाटा पूरा करना चाहती है। सरकार की आमदनी कम हो और खर्च ज्यादा हो तो अंतर को वित्तीय घाटा कहा जाता है। वर्तमान में वित्तीय घाटा तेजी से बढ़ रहा है, क्योंकि खाद्य पदार्थो, डीजल एवं फर्टिलाइजर पर दी जा रही सब्सिडी का बोझ बढ़ रहा है। चिदंबरम की सोच है कि सरकारी कंपनियों के शेयर बेचकर इस घाटे की भरपाई कर ली जाए। पेंच है कि पूंजी प्राप्ति का उपयोग चालू खर्च के पोषण के लिए किया जाना है। पूंजी प्राप्ति में जमीन, शेयर, मकान, मशीन आदि की बिक्री आती है। जैसे प्रिंटिंग प्रेस का मालिक या पूर्व में खरीदे गए

देश-विदेश में तमाम आलोचना के बाद संप्रग सरकार ने आखिरकार अपनी दूसरी पारी में बड़े आर्थिक सुधारों की शुरुआत करने का साहस दिखाया। मनमोहन सिंह सरकार की ओर से यह साहस तब दिखाया गया जब देश में आर्थिक प्रगति की रफ्तार लगातार घटती जा रही है और इसके चलते विश्व में भारत की साख भी प्रभावित हो रही है। पिछले दिनों योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने जब सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में वृद्धि दर महज पांच फीसदी ही रहने की संभावना व्यक्त की थी तभी यह महसूस किया जाने लगा था कि बड़े आर्थिक सुधारों में देरी बहुत भारी पड़ने जा रही है। सरकार के पास इसके अलावा अन्य कोई

प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा-माओवादी ने दैनिक जागरण की ओर से उठाए गए सवालों के जैसे जवाब दिए हैं उनसे यह और अच्छे से साबित हो रहा है कि नक्सली नेता वैचारिक रूप से बुरी तरह पथभ्रष्ट हो चुके हैं और वे अपनी ही बनाई दुनिया में रह रहे हैं। वे लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त कर न केवल सत्ता हथियाने का मंसूबा पाले हुए हैं, बल्कि ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे उन्होंने सत्ता संचालन का अधिकार वैधानिक तरीके से अर्जित कर लिया है। यदि वे इस खुशफहमी में नहीं होते तो सगर्व यह नहीं कह रहे होते कि फिरौती-उगाही करना इसलिए जायज है, क्योंकि उन्हें इतने बड़े तंत्र को चलाना पड़ रहा है। वे जिसे अ