देश

किसी कॉलम में ऐसे विचार लिखना आसान नहीं है जो लहर के खिलाफ हों खासतौर से उन अच्छे इरादे वाले लोगों के खिलाफ जिन्हें हमने खुद प्रोत्साहित किया है। मुझे ऐसी ही दुविधा का सामना करना पड़ा जब मैंने आप और उनके संभलकर चलने की जरूरत के बारे में लिखा। आम आदमी पार्टी इन दिनों सबकी पसंद है। मीडिया उसकी तारीफ करते नहीं थक रहा है। गरीब उसे अपना मसीहा मानते हैं। बोर हो चुके अमीर एक्जीक्यूटिव अपनी नौकरी छोड़कर आंदोलन में शामिल हो रहे हैं। बड़ी संख्या में युवा आप को बढ़ाने के लिए आगे आ रहे हैं। केजरीवाल के प्रधानमंत्री बनने और लोकसभा चुनाव जीतने की चर्चा है।

मनमोहन सरकार ने खुदरा कारोबार में एफडीआई को अनुमति के मुद्दे पर संसद में बहुमत साबित किया। पर क्या इससे वह विकास और सुधार के मसलों में निकम्मेपन के आरोप से मुक्ति पा सकती है? एफडीआई के मुद्दे ने सरकार को जरूर लाचार बनाया, लेकिन लकवाग्रस्त सरकार के आरोप पुराने हैं। अर्से से देश–दुनिया में चर्चा है कि मनमोहन सरकार को लकवा मारा हुआ है। यह नीतिगत लकवा है। इसी बात को हाल में रतन टाटा ने भी कहा है। रतन टाटा के मुताबिक, अगर एक स्टील प्लांट की मंजूरी में सात साल लगेंगे तो फिर भारत में कौन पैसा लगाएगा।

कई लोगों को यह पसंद नहीं है कि बजट को सुर्खियों  में स्थान मिले! लेकिन मेरा मानना है कि राजनीति की खबरों के बीच अगर बजट के बहाने दो सप्ताह के लिए हमारा ध्यान देश की आर्थिक सेहत की ओर जाता है तो यह अच्छी बात है! वर्ष १९९१ से हम यही उम्मीद करते आए है की वित्त मंत्री का बजट भाषण देश की भावी अर्थव्यवस्था का दृष्टिकोण पेश करे !लेकिन ६ जुलाई २००९ को ऐसा नहीं हुआ! राष्ट्र नई सरकार से अगले पांच साल के लिए आर्थिक मिशन का इंतजार कर रहा था, लेकिन प्रणव मुखर्जी यह अवसर चूक गए!

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केवल भारतीयों के बीच ही नहीं, पूरे विश्व में इस बात के खूब हल्ले है कि भारत एक महाशक्ति बन रहा है। हर दिन पाश्चात्य मीडिया में कोई न कोई खबर दिखाई पड़ती है, जिसमें भारत को भविष्य की महाशक्ति के रूप में दर्शाया जाता है। जाहिर है, ये बातें एक ऐसे देश को मीठी ही लगेंगी जिसे बीसवीं सदी में हताश राष्ट्र बताया जाता था। इस हताशा का मुख्य कारण हमारा खराब आर्थिक प्रदर्शन था, किंतु सुधारों की वजह से अब भारत की अवस्था बदल गई है और आज भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।

Author: 
गुरचरण दास