दान

दशकों तक भारत में अर्थशास्त्र का तात्पर्य गरीबी का अध्ययन रहा है। कुछ समय पहले तक कॉलेज में अर्थशास्त्र पढ़ाने की शुरुआत 'गरीबी के दोषपू्र्ण चक्र' नामक सिद्धांत (Theory of vicious circle of poverty) से की जाती थी। इस सिद्धांत के अनुसार गरीबी को दूर नहीं किया जा सकता। गरीब लोग तथा गरीब राष्ट्र के लिए गरीब रहना नियति है। वास्तव में यह कोरी बकवास है। यदि यह सत्य होता तो संसार आज भी पाषाण युग में होता। जीवनियों (biography) का इतिहास 'गरीबी से अमीरी का सफर' करने वाली कथाओं से भरा पड़ा है। हांगकांग और अमेरिका गरीब अप्रवासियों (immi

राजनीतिक दलों को सूचना अधिकार (आरटीआइ) के दायरे में लाने के केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) के हालिया फैसले से यह पुष्टि हो गई है कि अधिकांश राजनीतिक दल धनराशि जुटाने, पार्टी टिकट देने और इस प्रकार के अन्य अंतर्दलीय मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही के खिलाफ हैं। सबसे अधिक निराशा यह देखकर हुई कि कभी खुद को अलग तरह की पार्टी बताने वाली भारतीय जनता पार्टी भी घोटालों की दागी कांग्रेस की राह पर चल रही है और आदेश की वैधानिकता पर सवाल उठाकर कांग्रेस को बचाने का प्रयास कर रही है। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ने सीआइसी के आदेश को एडवेंचरिस्ट बताया और यह अजी

धर्मार्थ कार्य के क्षेत्र में सक्रिय ग्लोबल बिजनेस कंसल्टेंसी फर्म बेन एंड कंपनी द्वारा विगत दिनों विश्व के अनेक देशों में एक अध्ययन कराया गया। यह अध्ययन अलग-अलग राष्ट्रों के नागरिकों द्वारा किए जाने वाले धर्मार्थ कार्यों व उनकी रूचियों से संबंधित था। वैसे तो संस्था द्वारा यह अध्ययन समय-समय पर कराया जाता है और इसकी रिपोर्ट भी जारी की जाती है लेकिन संस्था द्वारा इस वर्ष जारी अध्ययन रिपोर्ट भारत के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। संस्था की रिपोर्ट में भारतीयों विशेषकर यहां के युवाओं में धर्मार्थ कार्यों के लिए दान देने की प्रवृत्ति में सकारात्मक परिवर्तन आने की बात कही गई है।