दहेज

लड़कों अथवा पुरुषों में ऐसा क्या है जो हमें इतना अधिक आकर्षित करता है कि हम एक समाज के रूप में सामूहिक तौर पर कन्याओं को गर्भ में ही मिटा देने पर आमादा हो गए हैं। क्या लड़के वाकई इतने खास हैं या इतना अधिक अलग हैं कि उनके सामने लड़कियों की कोई गिनती नहीं। हमने जब यह पता लगाने के लिए अपने शोध कीशुरुआत की कि क्यों वे अपनी संतान के रूप में लड़की के बजाय लड़का चाहते हैं तो मुझे जितने भी कारण बताए गए उनमें से एक भी मेरे गले नहीं उतरा। उदाहरण के लिए किसी ने कहा कि यदि हमारे लड़की होगी तो हमें उसकीशादी के समय दहेज देना होगा, किसी की दलील थी कि एक लड़की अपने माता-पिता अथवा अन्य पर

हमारी संस्कृति की अनेक खूबियों में से एक है उसका उदारवाद। हमारे ग्रंथों ने हमें सभी लैंगिक समूहों और उनकी यौन अभिरुचियों का सम्मान करने की सीख भी दी है, फिर चाहे वे हमसे भिन्न ही क्यों न हों। लेकिन इसके बावजूद आज भी हम भिन्न यौन अभिरुचियों वाले व्यक्तियों के प्रति पर्याप्त उदार और सहिष्णु नहीं हो पाते। उभयलिंगियों को तो हमने हाशिये का उपेक्षित समुदाय बना डाला है। बर्बर देशों की तरह हम 'व्यभिचारियों' को पत्थर मार-मारकर मार तो नहीं डालते, लेकिन एक तरह से उनका सामाजिक बहिष्कार जरूर कर देते हैं। उन्हें अन्य तरीकों से यंत्रणा दी जाती है और वे हमारी घृणा और हिकारत का वि

हाल में योजना आयोग ने एक ऐसा प्रस्ताव रखा है, यदि उसे सरकार ने मान लिया तो भारतीय समाज में न सिर्फ स्त्री की सामाजिक-आर्थिक हैसियत बढ़ेगी, बल्कि वह पति-पत्नी के रिश्ते में आमूल परिवर्तन भी ला सकता है।

योजना आयोग का वीमेंस एजेंसी एंड एमपॉवरमेंट नामक वर्किंग ग्रुप संपत्ति का अधिकार संबंधी एक ऐसा समग्र कानून चाहता है, जिसमें पति-पत्नी के बीच अलगाव होने या परित्याग की सूरत में दोनों के बीच कुल संपत्ति का बंटवारा बराबर-बराबर हो।