दलित

एससी एसटी अत्याचार कानून फिर उसी दमखम के साथ लागू हो गया है जैसा सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च के फैसले से पहले था। एससी एसटी अत्याचार संशोधन कानून में धारा 18-ए और जोड़ी गई है जो कहती है कि इस कानून का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से पहले ना जांच की जरूरत है और ना ही जांच अधिकारी को आरोपी की गिरफ्तारी से पहले किसी की इजाजत लेने की आवश्यकता।

Author: 
नवीन पाल

दलित इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (डिक्की) की ओर से बीते 6 जून को एक नया वेंचर कैपिटल फंड शुरू किया गया। इस फंड का मकसद है दलितों और आदिवासियों द्वारा चलाई जा रही कंपनियों में निवेश के लिए निवेशकों से 500 करोड़ रुपये जुटाना। कृपया इस पहल को सकारात्मक कार्रवाई (अफर्मेटिव एक्शन) के नाम पर उठाए गए एक और सदाशयी कदम की तरह न देखें।

दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद का स्पष्ट रूप से मानना है कि दलितों का जितना भला पूंजीवाद ने किया है उतना किसी अन्य विभूति द्वारा नहीं किया जा सका है। चंद्रभान प्रसाद का यह भी मानना है कि आजा बाजार जाति और मार्क्स से बड़ा हो चुका है। उनका कहना है कि वैश्वीकरण के साथ भारत में एडम स्मिथ का प्रवेश हुआ जिन्होंने मनु को चुनौती दी। यह बाजार है जहां आपकी जाति नहीं बल्कि आपकी उपयोगिता का सम्मान होता है। उन्होंने ये बातें इंडियन एक्सप्रेस के मुख्य संपादक शेखर गुप्ता को दिए एक साक्षात्कार के दौरान कही। पूरे साक्षात्कार को हूबहू नीचे पढ़ा जा सकता है...

इस साल जब कमानी ट्यूब की चेयरपर्सन कल्पना सरोज अपना पद्म श्री पुरस्कार राष्ट्रपति से ग्रहण करने जाएंगी तो वह उस अवसर पर हीरों का हार और कांजीवरम साड़ी पहनेंगी। हालांकि इस सम्मान को ग्रहण करने के लिए वह अपने हवाई जहाज से दिल्ली आना चाहती हैं लेकिन खरीद के लिए बातचीत तब तक पूरी होगी या नहीं, कहा नहीं जा सकता है।  वह पूछती हैं, 'आप क्या सोचते हैं?'  हालांकि उनकी आवाज थोड़ी भारी और गंभीर है लेकिन उनका ठिठोली करने का अंदाज बेहद आकर्षक है।

दलित विचारक व चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने कहा है कि देश के दलितों के उत्थान की प्रक्रिया में आरक्षण के मुकाबले मुक्त बाजार व्यवस्था ज्यादा कारगर है। उन्होंने कहा है कि आरक्षण की व्यवस्था महज 10 प्रतिशत लोगों का फायदा कर सकती है जबकि मुक्त बाजार व्यवस्था में 90 प्रतिशत दलितों के उत्थान की क्षमता है। बाजारवाद के फायदों को गिनाते हुए चंद्रभान ने कहा कि यह बाजारवाद की ही देन है कि सदियों से जारी दलितों और गैर दलितों के बीच के रहन-सहन, खान-पान और काम-काज का फर्क समाप्त हो गया है। वह एशिया सेंटर फॉर इन्टरप्राइज (एसीई) द्वारा आयोजित पहले अंतर्राष्ट्रीय एशिया लिबर्टी फोरम (एएलएफ) के

सरकारी नौकरियों के लिए प्रोन्नति में आरक्षण संबंधी विधेयक को लेकर पिछले दिनों राज्यसभा में जो कुछ हुआ, वह तो शर्मनाक है ही, इस संबंध में सरकार एवं प्रमुख दलों का रवैया उससे भी अधिक शर्मनाक है। समाजवादी पार्टी इसे साफ तौर पर सामाजिक न्याय के विरुद्ध मानती है। बसपा सुप्रीमो मायावती इसके लिए भाजपा से भी मदद की गुहार लगा चुकी हैं और बाद में इसे पारित न करा पाने के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों को समान रूप से जिम्मेदार भी ठहरा चुकी हैं। जाहिर है, वह इस विधेयक के पेश किए जाने को भी अपनी उपलब्धियों में गिनती हैं और आने वाले चुनावों में भुनाने की कोशिश भी करेंगी। भाजपा कई

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