झुग्गी झोपड़ी

यह जानते हुए भी कि अपना भारत महान ऐसा देश है, जहां इंसानों और इंसानियत की कदर कम होती है, हैरान हुई पिछले सप्‍ताह जब बुलडोजर चले कैंपा कोला बिल्डिंग के दरवाजों पर। हैरान हुई अधिकारियों और पुलिस वालों की बेरहमी को देखकर, और शायद सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश भी हैरान हुए होंगे, वरना न रुकवाते लोगों को बेघर करने की यह बर्बर कार्रवाई। 

एक दशक भी नहीं हुआ है जब उत्साही निवेश विशेषज्ञ और आर्थिक विश्लेषक भारत की तरक्की के गीत गा रहे थे। वे कहते थे भारत में इतनी क्षमता है कि अगले दो दशकों में यह दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक होगा। इसके लिए उन्होंने स्प्रेडशीट मॉडल्स का उपयोग किया। इसमें उन्होंने 8 से 10 फीसदी प्रतिवर्ष की वृद्धि दर डाली और अगले 30 साल का अनुमान निकाला। उन्होंने एमबीए स्कूलों में सीखा था कि कैसे ऐतिहासिक दरों के आधार पर पूर्वानुमान लगाते हैं। जाहिर है, कोई भी चीज जो 10 फीसदी की चक्रवृद्धि दर से बढ़ रही हो, 30 साल में महाकाय हो जाएगी (ठीक-ठीक कहें

प्रायः समाज शास्त्रियों, समता व समानता के पुरोधाओं और समाजसेवी राजनेताओं को शहरों की मलिन बस्तियों व झुग्गी झोपड़ियों की बढ़ती तादात पर अपने घड़ियाली आंसू बहाते और वहां रहने वाले लोगों के उद्धार के लिए भविष्य के वादों की घुट्टी पिलाते हम सबने सुना और देखा होगा। शहर की मलिन बस्तियों से संबंधित जब कोई रिपोर्ट किसी एनजीओ, कमेटी अथवा जनगणना आयोग द्वारा प्रकाशित की जाती है, अलग-अलग वर्ग द्वारा अपने अपने ढंग से इसे अमानवीय, यातना व नर्क जैसी उपमाओं से नवाजा जाना शुरू कर दिया जाता हो यहां तक कि शहरीकरण को ही इस पूरे वाकए के लिए दोषी साबित करने की भी होड़ शुरू हो जाती है। मजे की

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर