जीविका

देश के तमाम शहरों की सड़कें न सिर्फ लाखों कामगार गरीबों तथा अभावग्रस्त लोगों की आश्रयस्थली वरन उनकी रोजीरोटी का केंद्र भी हैं, जहां पर वे सस्ते और आकर्षक सामानों की दुकान सजाते हैं। शहरों में सड़क किनारे फुटपाथ पर आपकों ऐसे अनेक पुरष-महिलाएं पकाया हुआ भोजन, फल व सब्जियां, कपड़े, खिलौने, किताबें, घरेलू इस्तेमाल की चीजें व सजावटी सामान बेचते मिल जाएंगे। एक अनुमान के मुताबिक भारत में तकरीबन एक करोड़ लोग इस तरह सड़क किनारे सामान बेचते हुए अपनी आजीविका कमाते हैं।

स्किल डेवलपमेंट अर्थात् कौशल विकास वर्तमान दौर में एक वैश्विक मुद्दा बन चुका है। इसमें कोई शक नही कि तकनीक के इस दौर में दुनिया को स्किल्ड लोगों की जबरदस्त मांग है। दुनिया उन देशों की तरफ देख रही है जहाँ युवाओं की संख्या ज्यादा है और वे युवा वर्तमान दौर के हिसाब से कौशलयुक्त हैं। इस लिहाज से सोचा जाय तो भारत एक संभावनाओं का देश है क्योंकि यहाँ की पैसठ फीसद आबादी पैंतीस साल से कम आयु की है। लिहाजा युवाओं को स्किल्ड बनाने की चुनौती और दुनिया की अपेक्षाओं के अनुरूप युवाशक्ति तैयार करने का दबाव भी भारत पर है। अब सवाल है कि क्या हम अपने प्रयासों स

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शिवानंद दिवेदी
- 'चार' और 'पद्मिनी माय लव' को सर्वश्रेष्ठ डॉक्युमेंट्री अवार्ड, तिची गोश्ता व सिल्वर गांधी को भी मिली सराहना
- विजेता डॉक्यूमेंट्री निर्माताओं का काठमांडू में होगा सम्मान
 

लेह-लद्दाख घूमने गए अतुल कुमार नामक दिल्ली निवासी एक युवक को वहां के एक वर्ग विशेष की बहुलता वाले क्षेत्र में शिक्षा की दयनीय स्थति को देख काफी पीड़ा हुई। स्थानीय लोगों विशेषकर युवाओं से बातचीत में उसे पता लगा कि उन्हें पढ़ने का काफी शौक है लेकिन उन्हें पढ़ाने वाला कोई नहीं है। उन्होंनें बताया कि उनके गांव के सरकारी स्कूल में जो टीचर आते हैं वो महीनें में एक दो दिन ही क्लास लेते हैं और अधिकांश समय छुट्टी पर ही रहते हैं।

चीनी वस्तुओं के किसी भी बाजार में छाए रहने का मुख्य कारण उनका तुलनात्मक रूप से सस्ता होना होता है। लेकिन यदि देसी वस्तु के सस्ते होने के बावजूद उसी चीनी वस्तु की भारी मात्रा आयात की जाए और यहां के उत्पादकों की अनदेखी की जाए तो इसे नीति निर्धारकों की अदूरदर्शिता  नहीं तो और क्या कहेंगे।

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