जरूरत

केंद्रीय पर्यावरण और वन  मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय पर्यावरण नीति के मसौदे में प्रदूषक भुगतान करें,लागत न्यूनतम हो,और प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए बाजार पर आधारित प्रोत्साहनों पर बल दिया गया है। इसकी एक तार्किक परिणिती यह होनी चाहिए कि प्राकृतिक संसाधनों की स्वामित्व या प्रबंधन का जिम्मा उन समुदायों को सौंपा जाए जो उन पर निर्भर हैं। लेकिन उस मामले में यह नीति कम पड़ती है।यह कमी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में ज्यादातर सामूहिक प्राकृतिक संसाधन मुक्त संसाधनों में बदल चुकें हैं।

आइए हम जंगलों का उदाहरण लेते हैं।

हाल में टीवी पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने बड़े नाटकीय अंदाज में कहा, ‘भारत सरकार को स्पष्ट करना होगा कि वह वालमार्ट के साथ है कि इस देश के आम आदमी के साथ’।

मैंने जब उनका यह वक्तव्य सुना तो कुछ क्षणों के लिए हैरान रह गई। क्या ममता दी इतना भी नहीं समझ सकी हैं कि इस तरह की बातें करके वे भारत माता की तौहीन कर रही हैं? क्या इतना भी नहीं समझी हैं कि इतने विशाल, शक्तिशाली देश को विदेशी निवेशकों से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है? क्या इतना भी नहीं याद है उन्हें कि कितनी गुरबत हुआ करती थी इस देश में जब विदेशी निवेशकों का नामोनिशान न था?