छह दशक

दागी नेताओं को अयोग्य ठहराने और नकारात्मक मतदान को वैधता देने वाले सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला, एक अरसे से लंबित चुनाव सुधार की जरूरत को बल प्रदान करने वाले हैं। इन फैसलों पर देश में व्यापक सकारात्मक प्रतिक्रिया का आना, संकेत है कि चुनाव सुधार के पक्ष में जनमत तैयार हो रहा है। सुधार को लेकर चुनाव आयोग पहले से ही कोशिशें करता रहा है, लेकिन एक स्वस्थ लोकतंत्र में बदलाव और सुधार की जो प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए वैसा कुछ फिलहाल नहीं दिख रहा। जो समाधान लोकतंत्र के सर्वोच्च निकाय संसद से निकलना चाहिए वो न्यायालय से न

विगत 13 मई को भारतीय संसद ने स्थापना के साठ वर्ष पूरे कर लिए। इन साठ वर्षों के दौरान दुनिया ने सबसे बड़ी लोकतंत्रिक व्यवस्था को तरुणाई की दहलीज लांघ युवावस्था में पहुंचता देखा। इस दौरान इस व्यवस्था से सबकी अपनी-अपनी अपेक्षाएं और उम्मीदें जुड़ी रहीं। किसी ने इसे विश्व की आर्थिक महाशक्ति के तौर पर देखा तो किसी को इसमें वैश्विक राजनैतिक नेतृत्व की झलक दिखी। किसी ने इसे सामरिक दुनिया के सेनापति के तौर पर देखा। वर्ष 1947 में अहिंसा की अनकही, अनसुनी, अनदेखी ताकत के बल पर ब्रिटानी हुकूमत की जंजीरों से आजाद हो गणतंत्र बने इस राष्ट्र और इसकी व्यवस्था से    ये उम्मीद