घास

- वन कानून में बदलाव के लिए सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई जनहित याचिका

- याचिका में ट्रांजिट पास परमिट व्यवस्था खत्म करने की भी लगाई गई है गुहार

विश्‍व में भारत ऐसा देश है, जहां पर बांस सबसे ज्‍यादा पाया जाता है। मगर वन विभाग कानून के तहत इसे पेड़ की कैटेगरी में दर्ज किया गया है, यही कारण है कि इसकी गैरकानूनी ढंग से कटाई पर भारत में रोक है, लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि बांस कोई पेड़ नहीं है, बल्‍कि यह घास की ही एक प्रजाति का वंशज है।

भारत को छोड़कर बहुत से देशों में इसे घास का दर्जा प्राप्‍त है। बांस को पेड़ की कैटेगरी से हटाकर घास की कैटेगरी में शामिल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट जल्‍द ही सुनवाई करेगी।

बांस के पेड़ की बजाए घास होने के तथ्य के वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित और संवैधानिक तौर पर स्वीकृत हो जाने के बावजूद नौकरशाही और पहले से जारी व्यवस्था के कारण अब तक इसे घास के रूप वैधानिक मान्यता नहीं मिल सकी है। जिसके कारण इसकी कटाई और व्यवसायिक प्रयोग की मनाही है। यदि इसे घास के रूप में पर्यावरण और वन मंत्रालय से वैधानिक मान्यता मिल जाती है तो देश में न केवल हरे वृक्षों की कटाई में कमी आएगी बल्कि इसके सहारे आजिविका कमाने वाले लाखों आदिवासियों व जंगल पर निर्भर जनजातियों को व्यवसाय भी उपलब्ध हो सकेगा। यहां तक कि स्वयं योजना आयोग का भी मानना है कि इससे 5 करोड़ लोगों के रोजगार

पिछले वर्ष केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर स्पष्ट किया है कि बांस दरअसल घास है न कि इमारती लकड़ी। उनका यह पत्र निश्चित रूप से सार्थक दिशा में उठाया गया एक कदम  था । अब नईं पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने भी बांस के दस हजार करोड़ के व्यापार को पर नौकरशाही के एकाधिकार को खत्म करने के लिए उनके कई एतराजों को खारिज कर उन्होंने बांस को  लघु वन उपज घोषित कर दिया है। इससे आदिवासियों को बांस उगाने और बेचने की अनुमति मिल जाएगी। यदि जयंती नटराजन का फैसला सचमुच जमीनी स्तरपर लागू हो सका तो इससे करोड़ों आदिवासियों के जीव