गुटखा

दिल्ली में एकबार फिर से पॉलीथिन के प्रयोग व इसकी खरीद-बिक्री को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 15 के तहत प्रतिबंध की अनदेखी करने वालों पर 10 हजार से एक लाख रूपए तक का आर्थिक दंड अथवा सात वर्ष तक की सजा अथवा दोनों का प्रावधान किया गया है। इसके पूर्व वर्ष 2009 में भी दिल्ली में प्लास्टिक के प्रयोग पर रोक लगाया गया था। लेकिन उस समय 40 माइक्रोन से मोटे प्लास्टिक व उससे निर्मित वस्तुओं, कैरीबैग आदि को प्रतिबंध से मुक्त रखा गया था। हाल ही में राजधानी में गुटखे पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। हालांकि गुटखा, प्लास्टिक आदि के स्वास्थ्य व पर्यावरण पर प

प्रतिबंध को समस्या का एकमात्र समाधान मानने के दुष्परिणाम के रूप में राजधानी दिल्ली में प्लास्टिक व गुटखे पर लगी पाबंदी के बावजूद खुले आम बिक्री, प्रयोग और सेवन के तौर पर देखा जा सकता है। गुटखे पर लगे प्रतिबंध के लगभग तीन माह और प्लास्टिक पर प्रतिबंध को एक माह बीत जाने के बावजूद दिल्ली का कोई भी इलाका ऐसा नहीं है जहां प्लास्टिक बैग व गुटखों की उपलब्धता व प्रयोग खुलेआम न दिखता हो। और तो और डलाव व कूड़ा घरों में कूड़े से ज्यादा प्लास्टिक व पॉलीथीन देखने को मिल रहे हैं। मजे की बात तो यह है कि गुटखा उत्पादकों ने इस प्रतिबंध का भी आसान तोड़ निकाल लिया है। चूंकि पान मसाला व तंबा

उदाहरण के लिए चीनी व्स्तुओं पर प्रतिबंध उनकी घटिया गुणवत्ता व इसके अर्थव्यवस्था व स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को रोकने के लिए लगाया गया है। लेकिन भारतीय बाजार चीनी वस्तुओं से भरे पड़े हैं और खिलौनों आदि में प्रयुक्त रंग के संपर्क में आने के कारण बच्चों को कैंसर, दिल व फेफड़े की बीमारी हो रही है। क्या ही अच्छा होता कि चीनी वस्तुओं के लिए भारतीय बाजार खोल दिए जाए लेकिन इसके पूर्व उनके लिए कड़े मानक तय कर दिए जाएं और उनका अनुपालन भी सुनिश्चित किया जाए। इससे देश को कई फायदे होंगे। एक तो प्रतिबंध समाप्त होने के कारण चीनी सामान वैध तरीके से कस्टम व आयात शुल्क अदा कर देश